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16 फ़र॰ 2010

नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों से जेयूसीएस की अपील

साथी,
पत्रकार बंधुओं,



देश में नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद के नाम पर चल रहे सरकारी दमन के बीच मीडिया और आप सभी की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। सत्ता जब मीडिया को अपना हथियार व पुलिस पत्रकारों को अपने बंदूक की गोली की भूमिका में इस्तेमाल करे तो ऐसे समय में हमे ज्यादा सर्तक रहने की जरूरत है। पुलिस की ही तरह हमारे कलम से निकलने वाली गोली से भी एक निर्दोष के मारे जाने की भी उतनी ही सम्भावना होती है, जितनी की एक अपराधी की। हमें यहां यह बातें इसलिए कहनी पड़ रही हैं क्योंकि नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद जैसे मुददों पर रिपोर्टिंग करते समय हमारे ज्यादातर पत्रकार साथी न केवल पुलिस के प्रवक्ता नजर आते हैं, बल्कि उससे कहीं ज्यादा वह उन पत्रकारीय मूल्यों को भी ताक पर रख देते हैं, जिसके बल पर उनकी विश्वसनियता बनी है।

हमें दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि हाल ही में इलाहाबाद में पत्रकार सीमा आजाद व कुछ अन्य लोगों की गिरफ़्तारी के बाद भी मीडिया व पत्रकारों का यही रूख देखने को मिला। सीमा आजाद इलाहाबाद में करीब 12 सालों से एक पत्रकार, सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता के बतौर सक्रिय रही हैं। इलाहाबाद में कोई भी सामाजिक व्यक्ति या पत्रकार उन्हें आसानी से पहचानता होगा। कुछ नहीं तो वैचारिक-साहित्यिक सेमिनार/गोष्ठियां कवर करने वाले पत्रकार उन्हें बखूबी जानते होंगे। लेकिन आश्चर्य की बात है कि जब पुलिस ने उन्हीं सीमा आजाद को माओवादी बताया तो किसी पत्रकार ने आगे बढ़कर इस पर सवाल नहीं उठाया। आखिर क्यो? क्यों अपने ही बीच के एक व्यक्ति या महिला को पुलिस के नक्सली/माओवादी बताए जाने पर हम मौन रहे? पत्रकार के तौर पर हम एक स्वाभाविक सा सवाल क्यों नहीं पूछ सके कि किस आधार पर एक पत्रकार को नक्सली/माओवादी बताया जा रहा है? क्या कुछ किताबें या किसी के बयान के आधार पर किसी को राष्ट्रद्रोही करार दिया जा सकता है? और अगर पुलिस ऐसा करती है तो एक सजग पत्रकार के बतौर क्या हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती?

पत्रकार साथियों को ध्यान हो, तो यह अक्सर देखा जाता है कि किसी गैर नक्सली/माओवादी की गिरफ्तारी दिखाते समय पुलिस एक रटा-रटाया सा आरोप उन पर लगाती है। मसलन यह फलां क्षेत्र में फलां संगठन की जमीन तैयार कर रहा था/रही थी, या कि वह इस संगठन का वैचारिक लीडर था/थी, या कि उसके पास से बड़ी मात्रा में नक्सली/माओवादी साहित्य (मानो वह कोई गोला बारूद हो) बरामद हुआ है। आखिर पुलिस को इस भाषा में बात करने की जरूरत क्यों महसूस होती है? क्या पुलिस के ऐसे आरोप किसी गंभीर अपराध की श्रेणी में आते हैं? किसी राजनैतिक विचारधारा का प्रचार-प्रसार करना या किसी खास राजनैतिक विचारधारा (भले ही वो नक्सली/माओवादी ही क्यों न हो) से प्रेरित साहित्य पढ़ना कोई अपराध है? अगर नहीं तो पुलिस द्वारा ऐसे आरोप लगाते समय हम चुप क्यों रहते हैं? क्यों हम वही लिखते हैं,जो पुलिस या उसके प्रतिनिधि बताते हैं। यहां तक की पुलिस किसी को नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी बताती है और हम उसके आगे ‘कथित’ लगाने की जरूरत भी महसूस नहीं करते। क्यों ?

हम जानते हैं कि हमारे वो पत्रकार साथी जो किसी खास दुराग्रह या पूर्वाग्रह से ग्रसित नहीं होते, वह भी खबरें लिखते समय ऐसी ‘भूल’ कर जाते हैं। शायद उन्हें ऐसी ‘भूल’ के परिणाम का अंदाजा न हो। उन्हें नहीं मालूम की ऐसी 'भूल' किसी की जिंदगी और सत्ता-पुलिसतंत्र की क्रूरता की गति को तय करते हैं।

जर्नलिस्ट यूनियन फार सिविल सोसायटी (जेयूसीएस) सभी पत्रकार बंधुओं से अपील करती हैं कि नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद की रिपोर्टिंग करते समय कुछ मूलभूत बातों का ध्यान अवश्य रखें.


* साथियों, नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद तीनों अलग-अलग विचार हैं। नक्सलवाद/माओवाद राजनैतिक विचारधाराएं हैं तो आतंकवाद किसी खास समय, काल व परिस्थियों से उपजे असंतोष का परिणाम है। यह कई बार हिंसक व विवेकहीन कार्रवाई होती है जो जन समुदाय को भयाक्रांत करती है. इन सभी घटनाओं को एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता। नक्सलवादी/माओवादी विचारधारा का समर्थक होना कहीं से भी अपराध नहीं है। इस विचारधारा को मानने वाले कुछ संगठन खुले रूप में आंदोलन चलाते हैं और चुनाव लड़ते हैं तो कुछ भूमिगत रूप से संघर्ष में विश्वाश करते हैं। कुछ भूमिगत नक्सलवादी/माओवादी संगठनों को सरकार ने प्रतिबंधित कर रखा है। लेकिन यहीं यह ध्यान रखने योग्य बात है कि इन संगठनों की विचारधारा को मानने पर कोई मनाही नहीं है। इसीलिए पुलिस किसी को नक्सलवादी/माओवादी विचारधारा का समर्थक बताकर गिरफ्तार नहीं कर सकती है, जैसा की पुलिस अक्सर करती है.। हमें विचारधारा व संगठन के अंतर को समझना होगा।


* इसी प्रकार पुलिस जब यह कहती है कि उसने नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी साहित्य (कई बार धार्मिक साहित्य को भी इसमें शामिल कर लिया जाता है) पकड़ा है तो उनसे यह जरूर पूछा जाना चाहिये कि आखिर कौन-कौन सी किताबें इसमें शामिल हैं। मित्रों, लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी खास तरह की विचारधारा से प्रेरित होकर लिखी गई किताबें रखना/पढ़ना कोई अपराध नहीं है। पुलिस द्वारा अक्सर ऐसी बरामदगियों में कार्ल मार्क्स/लेनिन/माओत्से तुंग/स्टेलिन/भगत सिंह/चेग्वेरा/फिदेल कास्त्रो/चारू मजूमदार/किसी संगठन के राजनैतिक कार्यक्रम या धार्मिक पुस्तकें शामिल होती हैं। ऐसे समय में पुलिस से यह भी पूछा जाना चाहिए कि कालेजों/विश्वविद्यलयों में पढ़ाई जा रही इन राजनैतिक विचारकों की किताबें भी नक्सली/माओवादी/आतंकी साहित्य हैं? क्या उसको पढ़ाने वाला शिक्षक/प्रोफेसर या पढ़ने वाले बच्चे भी नक्सली/माओवादी/आतंकी हैं? पुलिस से यह भी पूछा जाना चाहिए कि प्रतिबंधित साहित्य का क्राइटेरिया क्या है, या कौन सा वह मीटर/मापक है जिससे पुलिस यह तय करती है कि यह नक्सली/माओवादी/आतंकी साहित्य है।

* यहाँ एक बात और ध्यान देने योग्य है की अक्सर देखा जाता है की पुलिस जब कोई हथियार, गोला-बारूद बरामद करती है तो मीडिया के सामने खुले रूप में (कई बार बड़े करीने से सजा कर) पेश की जाती है, लेकिन वही पुलिस जब नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी साहित्य बरामद करती है तो उसे सीलबंद लिफाफों में पेश करती है. इन लिफाफों में क्या है हमें नहीं पता होता है लेकिन हमारे सामने इसके लिए कुछ 'अपराधी' हमारे सामने होते हैं. आप पुलिस से यह भी मांग करे कीबरामद नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी साहित्य को खुले रूप में सार्वजनिक किया जाए.


* मित्रों, नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तारियों के पीछे किसी खास क्षेत्र में चल रहे राजनैतिक/सामाजिक व लोकतांत्रिक आन्दोलनों को तोड़ने/दबाने या किसी खास समुदाय को आतंकित करने जैसे राजनैतिक लोभ छिपे होते हैं। ऐसे समय में यह हमें तय करना होता है कि हम किसके साथ खड़े होंगे। सत्ता की क्रूर राजनीति का सहभागी बनेंगे या न्यूनतम जरूरतों के लिए चल रहे जनआंदोलनों के साथ चलेंगे।


* हम उन तमाम संपादकों/स्थानीय संपादकों/मुख्य संवाददातों से भी अपील करते हैं , की वह अपने क्षेत्र में नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी घटनाओं की रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी अपराध संवाददाता (क्राइम रिपोर्टर) को न दें. यहाँ ऐसा सुझाव देने के पीछे इन संवाददाताओं की भूमिका को कमतर करके आंकना हमारा कत्तई उद्देश्य नहीं है. हम केवल इतना कहना चाहते हैं की यह संवाददाता रोजाना चोर, उच्चकों, डकैतों और अपराधों की रिपोर्टिंग करते-करते अपने दिमाग में खबरों को लिखने का एक खांचा तैयार कर लेते हैं और सारी घटनाओं की रिपोर्ट तयशुदा खांचे में रहकर लिखते है. नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद की रिपोर्टिंग हम तभी सही कर सकते हैं जब हम इस तयशुदा खांचे से बहार आयेगे. नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद कोई महज आपराधिक घटनाएँ नहीं है, यह शुद्ध रूप से राजनैतिक मामला है.


* हमे पुलिस द्वारा किसी पर भी नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी होने के लगाए जा रहे आरोपों के सत्यता की पुख्ता जांच करनी चाहिये। पुलिस से उन आरोपों के संबंध में ठोस सबूत मांगे जाने चाहिये। पुलिस से ऐसे कथित नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी के पकड़े जाने के आधार की जानकारी जरूर लें।

* हमें पुलिस के सुबूत के अलावा व्यक्तिगत स्तर पर भी सत्यता की जांच करने की कोशिश करना चाहिये। मसलन अभियुक्त के परिजनों से बातचीत करना चाहिये। परिजनों से बातचीत करते समय अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत होती है। अक्सर देखा जाता है कि पुलिस के आरोपों के बाद ही हम उस व्यक्ति को अपराधी मान बैठते हैं और उसके बाद उसके परिजनों से भी ऐसे सवाल पूछते हैं जो हमारी स्टोरी व पुलिस के दावों को सत्य सिद्ध करने के लिए जरूरी हों। ऐसे समय में हमें अपने पूर्वाग्रह को कुछ समय के लिए किनारे रखकर, परिजनों के दर्द को सुनने/समझने की कोशिश करनी चाहिए। शायद वहां से कोई नयी जानकारी निकल कर आए जो पुलिस के आरोपों को फर्जी सिद्ध करे।

* मित्रों, कोई भी अभियुक्त तब तक अपराधी नहीं है, जब तक कि उस पर लगे आरोप किसी सक्षम न्यायालय में सिद्ध नहीं हो जाते या न्यायालय उसे दोषी नहीं करार देती। हमें केवल पुलिस के नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी बताने के आधार पर ही इन शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। ऐसे शब्द लिखते समय ‘कथित’ या ‘पुलिस के अनुसार’ जरूर लिखना चाहिये। अपनी तरफ से कोई जस्टिफिकेशन नहीं देना चाहिये।



पत्रकार बंधुओं,

यहां इस तरह के सुझाव देने के पीछे हमारा यह कत्तई उद्देश्य नहीं है कि आप किसी नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी का साथ दें। हम यहां कोई ज्ञान भी नहीं देना चाहते। हमारा उद्देश्य केवल इतना सा है कि ऐसे मसलों की रिपोर्टिंग करते समय हम जाने/अनजाने में सरकारी प्रवक्ता या उनका हथियार न बन जाए। ऐसे में जब हम खुद को लोकतंत्र का चौथा-खम्भा या वाच डाग कहते हैं तो जिम्मेदारी व सजगता की मांग और ज्यादा बढ़ जाती है। जर्नलिस्ट यूनियन फार सिविल सोसायटी (जेयूसीएस) आपको केवल इसी जिम्मेदारी का एहसास करना चाहती है।

उम्मीद है कि आपकी लेखनी शोषित/उत्पीड़ित समाज की मुखर अभिव्यक्ति का माध्यम बन सकेगी !!


- निवेदक
आपके साथी,

विजय प्रताप, राजीव यादव, अवनीश राय, ऋषि कुमार सिंह, चन्द्रिका, शाहनवाज आलम, अनिल, लक्ष्मण प्रसाद, अरूण उरांव, देवाशीष प्रसून, दिलीप, शालिनी वाजपेयी, पंकज उपाध्याय, विवेक मिश्रा, तारिक शफीक, विनय जायसवाल, सौम्या झा, नवीन कुमार सिंह, प्रबुद़ध गौतम, पूर्णिमा उरांव, राघवेन्द्र प्रताप सिंह, अर्चना मेहतो, राकेश कुमार।


जर्नलिस्ट यूनियन फार सिविल सोसायटी (जेयूसीएस) की ओर से जनहित में जारी

4 दिस॰ 2009

न रहे प्रभाष जोशी, न रहा वो जनसत्ता

राकेश कुमार

‘हिन्दी पत्रकारिता का अंतिम सम्पादक, ‘स्टेट्समैन‘ ‘भारतीय पत्रकारिता के शिखर पुरुष, ‘हिन्दी पत्रकारिता का एक स्तंभ, ‘शोषित-पीड़ित, वंचित और बेजुबानों की आवाज, असाधारण बौद्धिक साहस के धनी, यानी प्रभाष जोशी। इन तमाम सम्बोंधनों से सुशोभित पत्रकारिता का लौहपुरुष अब अंतिम रुप से विदा ले चुका है। इतिहास बन चुके प्रभाश जोशी के नाम पर अब हमारे बीच केवल उनक द्वारा कारे किये गये कागद ही रह गये हैं। प्रभाष जी को उपरोक्त सभी सम्बोधनों से याद करते हुए तमाम वरिष्ठ पत्रकार, राजनेता और बुद्धिजीवी साथियों ने उनके पंचतत्व में विलीन होने से पहले अपने-अपने हिसाब से उनके ऋणों को चुकाने की कोशिश कीे।
जिस नर्मदा की तलहटी में बसे गाँव मोती (इंदौर) की सरजमीं में जन्में प्रभाष जी पले-बढे़ और अपने पत्रकारिता जीवन की शुरुआत की, अंततः उसी नर्मदा की गोद में समाहित भी हो गये। नर्मदा नदी जिस तरह अन्य तमाम नदियों की अपेक्षा विपरीत दिशा पश्चिम में बही, उसी नदी के साये में पले-बढे प्रभाष जी पत्रकारिता जगत में एक अलग धारा बनकर आजीवन जनसरोकारी पत्रकारिता के प्रति ईमानदारी से समर्पित रहे। अपने जीवन में उन्होंने पत्रकारिता के लिए इतना कुछ किया, जिसे गिनाना मुश्किल नहीं, तो नामुमकिन जरुर है। अपने सम्पादकत्व में शुरु किये गये अखबार ‘जनसत्ता‘ के माध्यम से हिन्दी पत्रकारिता को जो धार, और जो कलेवर प्रभाष जी ने दिया, पत्रकारिता जगत ही नहीं, जनसरोकारों से संबंध रखने वाला हर आदमी इसके लिए, उनका आभारी रहेगा। 5 नवम्बर की रात अकस्मात उनका जाना लोकतंत्र के चैथे खम्भे ‘खबरपालिका‘ के उस सशक्त स्तम्भ का ढहना है, जिसके बिना उसका वजूद अंधकारमय नहीं तो धंुधला तो जरुर रहेगा।
सर्वोदयी और गांधीवादी आदर्शों में रचे-बसे प्रभाष जी 1972 में जेपी के आंदोलन में हमसफर बने और चम्बल के खूंखार डाकुओं का आत्मसर्पण करवाने से लेकर इन्दिरा गांधी सरकार का तख्तापलट करवाने तक में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। 1992 में बाबरी मस्ज़िद विध्वंस के समय आरएसएस व कारसेवकों के विरोध में खड़े रहकर उन्होंने जैसे धारदार काॅलम व लेख लिखे, वे आज भी प्रांसगिक हैं। साम्प्रदायिकता रुपी जहर को देश के लिए खतरा
मानकर उनने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके राजनीतिक मंच भाजपा से भी लोहा लिया और उनकी काली करतूतों को सामने लाने तक का काम किया। भारत की तथाकथित वामपंथी पार्टियों की भी खूब लानत-मलामत की। वे ताउम्र जनसरोकारी पत्रकारिता के प्रति समर्पित रहे। प्रभाष जी ये सब काम बड़े सहज ढंग से कर लेने वाले एक ऐसे मूर्धन्य पत्रकार थे, जिनकी जगह भर पाना शायद मुनासिब नहीं है। वे अपनी कलम के सामने किसी को नहींे बक्शते थे। उनकी कलम जब भी जिसके खिलाफ उठी, उसे लिख कर ही रुकी। इन्हीं आदर्शों ने उन्हें पत्रकारिता की कसौटी पर खरा सोना साबित किया, जिसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ेगी।
इसे प्र्रभाष जी की खूबी ही कही जाय कि उन्होंने जनसत्ता की टीम में कई विचाराधारा के लोगों को शामिल किये थे। वे जिन राजनेताओं, पार्टियों और धर्मावलंबियों की रीति-नीति पर खूब खरी-खोटी लिखते थे, वे भी उनके प्रसंशक के बतौर देखे गये। वे वास्तव में एक असाधारण बौद्धिक साहस के धनी व्यक्ति थे। इंदौर के एक हिन्दी दैनिक ‘नई दुनिया‘ से पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले प्रभाष जोशी आज कितने पत्र-पत्रिकाओं में बिखरे थे, इसका भी अनुमान लगा पाना कठिन है।
यह प्रभाष जी की लेखनी की ही देन थी कि कभी जनसत्ता उनके समय में दो लाख के आकंड़े को पार कर रहा था। इसी से उनके विचारों, आदर्शों और जनसरोकारी पत्रकारिता का पता लगाया जा सकता है। मीडिया में बढ़ रहे बाजारवाद को लेकर वे न केवल चिंतित रहे बल्कि उसके विरोध में संघर्ष छेड़ने से भी पीछे नहीं हटे। पत्रकारिता के गिरते मूल्यों के प्रति न केवल चिंतित रहे बल्कि उसके विरोध में लिखा भी। यहां तक कि उन्होंने अपने रहते जनसत्ता पर बाजारवाद को दूर-दूर तक फटकने नहीं दिया। जनसत्ता से सेवानिवृत्त होने के बाद भी जब तक उनका प्रभाव चलता रहा, उन्होंने जनसत्ता में विज्ञापन तक निकलना मुश्किल कर देते थे। उनका यह प्रभाव जैसे-जैसे कम होता गया वैसे-वैसे आम जन की ‘जनसत्ता‘ में भी विज्ञापनों की भरमार होने लगी, जो सिलसिला निरन्तर जारी है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि जनसत्ता में शुरु हुआ विज्ञापन का यह खेल आखिरकार कहां जाकर थमता है।
11 नवम्बर की सुबह उठा दरवाजा खोला, तो कुर्सी पर पड़ा अखबार देखा जो कुछ बदला सा नजर आ रहा था। अखबार उठाया और खोला तो आखे एक बार ठहर सी गयी कि ‘जनसत्त‘ का भी ऐसा हस्र हो सकता था, जो कभी सोचा भी नहीं था। 11 नवम्बर के लखनऊ अंक में पूरे पेज पर एक विज्ञापन छपा था जो तमाम अन्य हिन्दी-अंग्रेजी अखबारांे की भांति ‘जनसत्ता‘ में भी फ्रंट में फ्रंट पेज लगाया गया था। विज्ञापन में एक बच्ची हाथों में हवाई जहाज लिये दौड़ रही थी और उसके उपरी हिस्से में बड़े अक्षरों में लिखा था कि ‘90 वर्ष से अधिक समय से एक बैंक दे रहा है प्रेरणा, इंडिया को सपने देखने की‘। ये शब्द साफ तौर पर इस बात को बयां कर रहे हैं कि ‘जनसत्ता‘ भी 15 सालों से इस सपने को सजोये बैठे था जिसे वह प्रभाष जी के निधन के छठे दिन पूरा कर दिखाया। वह चित्र भी इस बात का संकेत दे रहा है कि आमजन के लिए बनाया गया ‘जनसत्ता‘, की अगली जनवादी उड़ान में कुछ ऐसे लोगों की ही आवाज होगी। अच्छी बात तो यह है कि यूनियन बैंक 90 सालो से भारत को सुनहरे सपने देखने की प्रेरणा देता ही रहा लेकिन ‘जनसत्ता‘ के बाजारवादी सम्पदकों ने 15 सालों से सजोये अपने सपने को पूरा कर दिखाया। ‘जनसत्ता‘ के इतिहास में शायद यह पहला दिन था जब इस तरह का कोई विज्ञापन छपा।
इस बात का स्पष्टीकरण करना चाहा कि ‘जनसत्ता‘ में कभी इस प्रकार के विज्ञापन छपे थे। सुबह-सुबह ‘जनसत्ता‘ से जुड़े एक वरिष्ठ पत्रकार से बात की तो वे बड़े दुखी भाव में बोेले कि अब ‘जनसत्ता‘, वो ‘जनसत्ता‘ नहीं रहा जिसे प्रभाष जोशी ने गढ़ा और रचा था। जनसत्ता पर उनका इतना प्रभाव था कि उनके रहते इस तरह का विज्ञापन निकालने की हिम्मत कभी कोई सम्पादक नहीं जुटा सका। एक वो दिन थे और यह भी एक दिन है, जिसे ‘जनसत्ता‘ में बढ़े बाजावादी बर्चस्व के रुप में याद किया जायेगा। उन्होंने यहां तक बताया कि अब इस बदलाव को प्रभाष जी के चहेते भी नहीं रोक सकते हंै चूंकि यह सब दिल्ली के एसी कोठरियों में सालों-सालों तक बाहर न निकलने वाले बुद्धिजीवी लोग डिसाइड करते है कि अखबार का लेआउट आज कैसे बनेगा और पहले पन्ने पर क्या-क्या जायेगा, क्या नहीं ?
जिस प्रभाष जोशी ने अपना खून-पसीना एक कर ‘जनसत्ता‘ को आमजन का अखबार बनाया और आजीवन बनाये रखने के लिए प्रतिबद्ध रहे उसी प्रभाष जोशी के निधन पर ‘जनसत्ता‘ में एक सम्पादकीय भी नहीं छपा, जबकि उस दिन के लगभग सभी अखबारों में छपा था। पर इससे भी बड़ी दुखद बात तो यह है कि प्रभाष जी अपने जीते जी जनसत्ता में जिस चीज को दूर-दूर तक फटकने नहीं दिये उसी चीज को उनके पंचतत्व में विलीन हुए सप्ताह भी नहीं हुआ होगा कि बाजारु किस्म के संपादकों ने जनता के सामने परोसना शुरु कर दिया। हालांकि बाजारवाद का प्रभाव पिछले कुछ महीनों से बढ़ने लगा था। मई-जून के महीनों में हेड मास्ट के नीचे ‘टोरेक्स‘ कफ सीरप का ऐड निकल रहा था। जो सम्भवतः पहले से ही ‘जनसत्ता‘ के जनवादी पत्रकारों की गले की खिचखिच दूर करने और मानसिक रुप से तैयार रहने के लिए दिया जा रहा था।
इन सब के बावजूद जीवन के आखिरी साल में कुछ पत्रकार बंधुओं द्वारों पत्रकारिता के इस युगपुरुष को भी कर्मकाण्डी-ब्राह्मणवादी सोच वाला पत्रकार कहकर प्रचारित किया गया। जो बहुत हद तक सही भी है जिसे वे स्वयं स्वीकार भी करते थे कि वे एक कर्मकाण्डीय हिन्दू हैं। लेकिन उनका यहां हिन्दू होने का धर्म त्रिसूल और लाठी चलाने वाले संघियों के समनान्तर ही नहीं उनके खिलाफ भी था। जिसे उन्होंने अपनी पुस्तक हिन्दू होने के धर्म में व्याख्यायित भी किया है। हालांकि एक कर्मकाण्डीय हिन्दू और गांधीवादी-सर्वोदयी होने की जो राजनैतिक कमजोरियां होती हैं उनसे वे भी मुक्त नहीं थे और समय-समय पर ये कमजोरिया उजागर भी हो जाती थीं। जैसे पिछले दिनों ही वे जनसत्ता में जेपी आंदोलन में संघियों को शामिल करने की ऐतिहासिक ‘भूल’ को जायज ठहराने लगे थे, या भाजपा के वरिष्ठ नेता हृदय नारायण दिक्षित के पुस्तक का विमोचन करने पहुंच गये थे।
आमजन के मुद्दे की आवाज बनकर जनप्रतिनिधियों और संसद को कठघरे में खड़ा करने के लिए तत्पर रहने वाले प्रभाष जोशी आजीवन बिना रुके बिना थके वंचित, बेजुबान लोगों की आवाज बनने के लिए प्रतिबद्ध रहे। मीडिया में सत्ता प्रतिष्ठानों और बाजारवाद के बढ़ते दखल के खिलाफ लड़ने के लिए बेचैन रहे।
उनके इसी स्वभाव के चलते हम पत्रकारिता के छात्रों ने उनको, इलाहाबाद विश्वविद्यायल में हो रहे शिक्षा के निजीकरण के विरोध म,ें चल रहे अपने आंदोलन में बुलाना चाहा। जब हमने उनसे बात की तो उन्होंने पत्रकारिता में बढ़ रहे बाजारवाद के विरोध में अपनी आवाज मुखर करने के लिए हमारे आंदोलन में आने का आमंत्रण सहस्र स्वीकार कर लिया। जबकि प्रभाष जी हममें से किसी को पहले से नहीं जानते थे। 30 सितम्बर को उनके आने को लेकर हम सभी छात्रों में एक अलग ही प्रकार का माहौल था। हमने तय किया कि इस पूरे आंदोलन का केन्द्र रहा पत्रकारिता विभाग का लान जिसे हमने ‘खबरचैरा‘ का नाम दिया है और जहां मीडिया की ताकत को दर्शाता स्टैचू है, जिसके इर्द-गिर्द हमने आंदोलन से जुड़े झण्डों और खबरों को चिपकाया है, उसका विधिवत उद्घाटन प्रभाष जी से करवायेंगे। और हमने करवाया भी।
इस समय तक आन्दोलन में कोई सफलता न देख हम छात्रों का उत्साह काफी कम हो गया था। छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा ‘‘पत्रकारिता के जिस मूल्य को बचाने और जिन बाजारवादी शक्तियों के दखल को रोकने की लड़ाई लड़ रहे हो उसमें कभी पीछे मत हटना, चाहे इसके लिये सर कटाने की नौबत ही क्यों न आ जाय।‘‘ ऐसी नौबत आयी तो इसमें कटने वाला पहला सर प्रभाश जोशी का होगा। 72 वर्षीय श्री जोशी की इन बातो को सुनकर छात्रों में आंदोलन के प्रति एक नया उत्साह जागा। उनकी बातों का छात्रों में इतना प्रभाव रहा कि जो छात्र आंदोलन में भाग लेने से कतराते थे वे भी अब आंदोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने लगे। पत्रकारिता में खत्म हो रही जनक्षधरता और उसके मूल्य के प्रति वे कितने चिंतित रहते थे उनकी इस चिंता का पता इसी बात से लगा सकता हैं कि अपने उस दिन के पूरे व्याख्यान में कई बार उनकी आखे आंसू से भर आईं। इस दौरान वे एक-एक छात्र, जो उनके पास गया सब से बातें करते रहे, कभी किसी के सर पर हाथ रखते हुए तो कभी किसी के कन्धे पर हाथ फेरते और उनसे पूछते कि पत्रकारिता में आने का मन कैसे हुआ।
इन सब के साथ-साथ प्रभाष जी के अन्दर अपने पुराने मित्रों के प्रति अगाध प्रेम देखने को मिला। वे अपने जितने अन्य कामों में उत्सुक रहते थे उतने ही अपने मित्रों से मिलने-जुलने में भी उत्सुक दिखे। दोपहर के समय अपने एक अजीज मित्र वरिष्ठ वामपंथी नेता कामरेड जियाउल हक से मिलने उनके घर स्वयं चलकर गये और देर शाम गेस्ट हाउस जाने तक वे उनके साथ रहे। प्रभाष जी की यह विशेषता ही थी कि बच्चे हों या बूढ़े वे सब को अपना दोस्त बना लेते थे। उनका यह पहलू तब देखने को मिला जब हम अपने कुछ साथियों सहित उन्हें रेलवे स्टेशन छोड़ने गये। प्रभाष जी को एक दफा सीट पर बैठा दिया गया लेकिन प्रभाष जी थे कि एक दोस्त की तरह बोगी से बाहर निकलकर ट्रेन छूटने तक प्लेटफार्म पर खड़े होकर हम छात्रों से आंदोलन व पत्रकारिता तथा विश्वविद्यालयों के बदलते स्वरुप पर चर्चाएं करते रहे। इसी बीच ट्रेन की सीटी बजी और वे चले गये-----।

6 नव॰ 2009

पत्रकारिता जगत के पुरोधा प्रभाष जोशी के निधन पर श्रद्धांजलि



प्रभाष जोशी आम आदमी के लिए लड़ने वाले योद्धा थे: जियाउल हक

इलाहाबाद, 6 नवम्बर 2009! पत्रकारिता ज़गत के सशक्त हस्ताक्षर एवं जनसत्ता के संस्थापक संपादक प्रभाष जोशी नहीं रहे। देश के अंदर पत्रकारिता को जनसरोकारों से जोड़ने में उन्होंने प्रभावकारी भूमिका निभाई थी। वे आजीवन पत्रकारिता को आम जनजीवन की आवाज बनाने के लिए प्रतिबद्ध रहे। मीडिया जगत में सत्ता प्रतिष्ठानो और बाजार के दखल के खिलाफ लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए वे अंतिम समय तक बेचैन रहे। आज वह हमारे बीच मौजूद नहीं हैं। देश के सामाजिक और लोकतांत्रिक आंदोलनों को उनकी कमी लम्बे समय तक खलेगी। उनके निधन पर पत्रकारिता विभाग की तरफ से आज एक शोक सभा का आयोजन किया गया, जिसमें बतौर मुख्य अतिथि जाने-माने समाजसेवी और प्रभाष जोशी के पुराने साथी वरिष्ठ काॅमरेड जियाउल हक ने विभाग के सामने बने खबर चैरा प्रांगण में उनकी तस्वीर पर माल्यार्पण कर श्रद्धासुमन अर्पित किये। इसी क्रम में विभाग के समस्त छात्र छात्राओं द्वारा भी उनकी तस्वीर पर पुष्पार्पण किया गया।

प्रभाष जी को श्रद्धांजलि देते हुए काॅमरेड जियाउल हक ने कहा कि जोशी जी का जाना पूरे हिन्दुस्तान के जनवादी प्रगतिशील सोच रखने वाले लोगों के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उन्होंने कहा कि प्रभाष जी की अचानक हुई मृत्यु से उन्हे इतना सदमा पहुंचा है जिसे वे शब्दों में बयां नहीं कर सकते। उनका कहना था कि प्रभाष जी सिर्फ एक पत्रकार ही नहीं थे बल्कि आम जनता से जुड़े मुद्दों पर अपनी मुखर आवाज और धारदार कलम के बूते संघर्ष करने वाले एक योद्धा थे। वे आम आदमी के मुद्दों पर उनकी आवाज बनकर जनप्रतिनिधियोें और संसद तक को कटघरे में खड़ा करने वाले एक सशक्त आधार स्तम्भ थे। इस स्तम्भ का न रहना आमजन के लिए एक ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई होना आने वाले समय में मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।
इस दौरान छात्रों का कहना था कि पिछले 30 सितम्बर को विभाग द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन के समर्थन में आये प्रभाष जोशी ने छात्रों से ये वादा लिया था कि वे किसी भी कीमत पर अपने कदम पीछे नहीं हटायेंगे। छात्रों ने अपने आन्दोलन के 65वें दिन आज एक बार फिर उनकी उस बात को याद करते हुए संकल्प लिया कि वे अपने आंदोलन को जारी रखेंगे। छात्रों ने कहा कि प्रभाष जी, पत्रकारिता के जिस जनपक्षधर स्वरुप और लोकतंात्रिक मूल्यों को बचाने लिए आजीवन संघर्षरत रहे, हम पत्रकारिता के छात्र उनके इन आदर्शों को आत्मसात करते हुए पत्रकारिता के इन सरोकारों को बचाने के लिए दृढ़संकल्पित हैं।
इस क्रम में प्रभाष जोशी द्वारा आंदोलन के समर्थन में विभाग में दिये गये भाषण की डाक्यूमेंट्रªªी फिल्म भी दिखाई गयी। इस दौरान पूर्व आइएएस श्री राम वर्मा, वरिष्ठ गांधीवादी श्री बल्लभ, पुनीत मालवीय,जनसत्ता के पत्रकार राघवेंद्र, आदि लोग उपस्थित रहे।

समस्त छात्र
पत्रकारिता विभाग
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद
9721446201,9793867715,9307761822

प्रभाष जोशी जी ने दी पत्रकारिता छात्र आन्दोलन को नई धार

हिन्दी पत्रकारिता के पितामह और पत्रकारिता के पेशेगत आदर्शाें को एक नई ऊंचाई देने वाले प्रभाष जोशी अब हमारे बीच नहीं रहे। एक बारगी सुनकर यकीन नहीं हुआ कि जन अधिकारों और प्रजातांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाला पुरोधा अचानक हमे छोड़ गया। पिछले 30 सितम्बर को ही वो हमारे बीच हमारे विभाग में थे- हमारे आंदोलन के हमराह के रुप में। विश्वविद्यालय के कोने में उपेक्षित पड़े हमारे छोटे से विभाग द्वारा विश्वविद्यालय प्रशासन की गलत नीतियों और शिक्षा के निजीकरण के विरोध में जब अपने आंदोलन की शुरुआत की गयी तो हमारे इस संघर्ष में सबसे पहले आने वालों में एक नाम प्रभाष जोशी का भी था। हम लोगों में कोई भी ऐसा नहीं था, जिसे वे पहले से जानते रहे हों, लेकिन जब हमने उन्हें अपने आंदोलन के बारे बताया और उनसे साथ आने का आग्रह किया तो उन्होंने अपनी सेहत और स्वास्थ्य की बिल्कुल परवाह न करते हुए हमारे समर्थन में इलाहाबाद आना सहर्ष स्वीकार कर लिया और इसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा उन्हें आने से रोकने की सारी कोशिशों के बावजूद वे यहां आये। हमारे मंच से बोलते हुए वे कई बार भावुक हुए और कई बार अपनी मृत्यु को भी याद किया। यहां तक कि हमारे विभाग के आंदोलन के लिए उन्होंने अपना सर तक कटाने की बात कही।
प्रभाष जी का पूरा जीवन हमारे जैसी युवा पीढ़ी के लिए आदर्श और प्रेरणा स्रोत रहेगा, विशेष कर हमारे विभाग के लिए क्योंकि हमारे विभाग में आकर उन्होंने हमारे संघर्ष को एक नई धार दी। प्रभाष जोशी का जाना हिन्दी पत्रकारिता के एक ऐसे मूर्धन्य सितारे का जाना है, जिसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ने वाली। उनके जाने से पत्रकारिता जगत में जो शून्य पैदा हुआ है उसकी पूर्ति आने वाले लम्बे समय तक सम्भव नहीं दिखती। इस दुख की घड़ी मे हम उनके परिवार के प्रति अपनी पूरी संवेदना और सहानुभूति व्यक्त करते हैं और ईश्वर से कामना करते हैं कि उनके परिवार को इस दुख को सहने की शक्ति प्रदान करे। जाते समय विभाग के छात्रों से भावुक होकर उन्होंने कहा था कि तुम लोगों ने जो लड़ाई शुरु की है, इससे कभी पीछे मत हटना और इस आंदोलन में हर कदम पर मैं तुम्हारे साथ हूं। उन्होंने यहां तक कहा कि इस संघर्ष में अगर कभी सर कटाने की भी नौबत आयी तो उसमें पहला सर प्रभाष जोशी का होगा। इसके बाद हम सभी ने उन्हें विश्वास दिलाया कि हम किसी भी हालत में अपने कदम पीछे नहीं लेंगे। आज हमारे आंदोलन का 65वां दिन है और हमारा विरोध लगातार जारी है। पत्रकारिता के सरोकारों को जिन्दा रखने के लिए हम आज भी सड़को पर हैं और इस बात के लिए दृढ़ संकल्पित भी, कि हम आजीवन पत्रकारिता के आदर्शाें को बचाने के लिए लड़ेंगे और अगर जरुरत पड़ी तो मरेंगे भी। शायद यही हमारी तरफ से पत्रकारिता जगत के इस भीष्मपितामह को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

नाम आँखों के साथ

समस्त छात्र
पत्रकारिता विभाग
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद

17 सित॰ 2009

लाजीम है कि हम भी देखेंगे !

दोस्तों,
पिछले कई दिनों से इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आपके आंदोलन की खबरे पढ़ता रहा हूं। मन किया कि आपको बधाई दूं सो लिख रहा हूं । आपको सलाम! इस बात पर कि आपने अपनी असहमति जाहिर करने की ठानी, विरोध का हौसला दिखाया. आपका आंदोलन किसी तरह की हार या जीत के उद्देश्य से नहीं है, होना भी नहीं चाहिए. इतने जोश-खरोश के साथ अगर आप विद्या और ज्ञान के तिजारत के खिलाफ खड़े हैं तो फिर नतीजा चाहे जो हो, जीते हुए आप ही माने जाएंगे. आपके बाद वहां पढ़ने आने वाले लोगों के लिए यह सबक ही नहीं होगा, संतोष की बात भी होगी कि कम से कम आपने विद्या मंदिर को कलंकित करने, पढ़ाई के नाम पर गोरखधंधे को रोकने की कोशिश की और साम›र्य भर की. इलाहाबाद में कुछ बरस रहा हूं, विश्वविद्यालय से करीब का नाता रहा है. वहां कई शिक्षक मेरे आत्मीय हैं और इन वर्षों में पश्रकारिता विभाग के तमाम विद्यार्थियों को मैं जानता आया हूं. विभाग में संसाधनों की कमी और तमाम तरह की विषमताओं के बीच मैंने सुनील को अपने विद्यार्थियों की बेहतर पढ़ाई के लिए जूझते हुए देखा है. सुनील अपनी पेशेगत ज्मेदारियों को लेकर किस कदर संजीदा हैं, यह आपके सीनियर्स बखूबी समझते होंगे. ये बातें मैं सटिüफिकेट देने के इरादे से नहीं कह रहा हूं, और यह मेरा अधिकार क्षेश्र भी नहीं है. मगर सेंट्रल यूनिवçर्सटी बनने और आपके नए स्वनामधन्य वीसी के आने की खबर पर सुनील का उत्साह मैंने देखा है. वह उन्साह एक समर्पित शिक्षक का उत्साह था, जिसे अब अपने विद्यार्थियों के लिए जयादा संसाधन मिलने की उम्मीद बंधी थी. उस शिक्षक को ऐसी सांसत में डालने का उपक्रम जिन लोगों ने भी किया हो, वे स्वधन्यमान (यानी जो खुद को धन्य मानता हो) भले हों, विश्वविद्यालय और विद्यार्थियों के हितैषी हरगिज नहीं हो सकते. अंधी कमाई के लिए उटपटांग तरीके अख्तियार करते आए लोगों से भला आप सबको भी और क्या उम्मीद होनी चाहिए. मैं ये बातें किसी व्यक्ति के लिए नहीं कह रहा. व्यक्ति चाहे वह कितना बड़ा और विद्वान क्यों न हो अगर अपने संस्थान, अपने समाज की भलाई नहीं कर सकता तो उसकी विद्वता का मोल दो कौड़ी भी नहीं. व्यक्ति संस्थान से बड़ा नहीं होता, लोग आते-जाते रहते हैं, संस्थाएं और व्यवस्थाएं बची रहती हैं और वे ही किसी काम को आगे ले जाती हैं. कलम को सन्ता के खिलाफ होना चाहिए, यही उसका धर्म है. अच्छा है कि पढ़ाई के दौरान आपने यह सबक भी सीख लिया. यकीन करें, यह जिदगी में बहुत काम आने वाला सबक है. विरोध के लिए नारे लगाना भर काफी नहीं, जरूरी है कि सच्चाई में भरोसा हो और अपनी आन की हिफाजत करने का शऊर आता हो। वरना अना की दुहाई देने से तो वे लोग भी नहीं चूकते जो मौका पड़ने पर बड़ी खामोशी से इसकी तिजारत कर आते हैं- कभी ओहदे और पैसे के फायदे के लिए, कभी टुच्ची सहूलियतों के लिए और कभी यूं ही यानी आदतन. सहूलियतों के लिए समझौते की लत पड़ जाती है और हकीम लुकमान अगर होते तो उनके पास भी इसका इलाज शायद ही होता. आप उन तमाम सहूलियतपसंद और सुविधाभोगियों के बारे में जरा भी न सोचें जो आपको सच के साथ खड़ा जानकर भी साथ आने या खड़ा होने में संकोच कर रहे हैं. कोई प्रपंच या कपट आपके आन्मबल से बढ़कर नहीं. और अब तक तो आप भी यह जान गए हैं कि इस लड़ाई में आप अकेले नहीं हैं. इलाहाबाद के इंसाफपसंद लोगों की बड़ी जमात तो आपके साथ है ही, हम सभी आपके साथ हैं. फैज की यह नजम याद हैं न आपको. मौका है कि एक बार इसे फिर पढ़ें, जोर-जोर से पढ़े और हो सके तो उन्हें भी सुना दें, जिन्हें अपने सिंहासन और ताज पर बड़ा नाज है.
हम देखेंगे/ लाजीम है कि हम भी देखेंगे/ वो दिन के जिसका वादा है/ हम देखेंगे।जब जुल्म- ओ-सितम के कोह-ए-गरां/ रूई की तरह उड़ जाएंगे/ हम मेहकुमों के पांवों तले/ ये धरती धड़ धड़धड़केगी/ और अहल-ए-हुकुम के सर ऊपर/ जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी/ हम देखेंगे.

प्रभात

14 सित॰ 2009

कुलपति (?) के नाम पत्रकारिता विभाग के विद्यार्थियों का खुला पत्र

महोदय,

आज से चंद साल पहले जब विश्वविद्यालय की प्रवेश परी़क्षा के पेपर लीक होने के सवाल पर आपने प्रशासन के लोगों को साथ लेकर गांधी भवन तक मार्च किया था, विश्वविद्यालय की अस्मिता और प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए तब केवल विश्वविद्यालय में चंद शिक्षक और कुछ ही प्रशासन के नुमाइंदे ही आपके साथ थे।

आज जब पत्रकारिता विभाग की अस्मिता और प्रतिष्ठा पर आंच आ रही है और तो वहां के शिक्षक अपने सभी विद्याथर््ीिओं के साथ उसी तरह गांधी भवन जाते हैं। ये संकल्प लेने के लिए की हम अपने मान सम्मान और विचारों पर अडिग रहेंगे तो आप उस विभाग के सात साल विभागाध्यक्ष रहे सुनील उमराव को नोटिस थमाते हैं कि वो परिसर में अराजकता फैला रहे हैं और वीसी के कथित मानसम्मान को ठेस पहुंचा रहे हैं। क्या आज वीसी का मानसम्मान एक विभाग या शिक्षक से अलग होता है? क्या विश्वविद्यालय जैसी अकादमिक संस्थाओं में विचारों को भैंस की तरह जंजीरों में बांधा जा सकता है। जब श्री राजेन हर्षे वीसी की कुर्सी की गरिमा को बनाये नही रख पा रहें है तो उस कुर्सी की गरिमा को यह कार्य कैसे आघात पहुंचा सकता है। सीनेट हाल में बच्चों की तरह पूरे विश्वविद्यालय के अध्यापकों द्वारा अपने को ‘‘हैप्पी बर्थडे टु यू’’ गवाकर विश्वविद्यालय की ऐतिहासिक गरिमा को ध्वस्त कर नया अध्याय लिखा है। क्या एक शिक्षक को अपने पदोन्नति और प्रशासनिक पदों की भूख इतनी वैचारिक अकाल पैदा करती है कि सभी एक सुर में हैप्पी बर्थ डे प्रायोजित करते है। यह विश्वविद्यालय में किस प्रकार की परिपाटी स्थापित करने की कोशिश की जा रही है।

राजेन हर्षे के कुलपति बनने के बाद हर मंच पर खड़े होकर यहां पर अकादमिक स्तर को बढाने की दुहाई देते रहे हैं और विश्वविद्यालय के ज्यादातर अध्यापकों पर न पढाने का आरोप लगाते रहे है परंतु व्यवहार में क्लास न लेने वाले शिक्षकों के इर्दगिर्द घिरे रहे है। और उनकी सलाह से विश्वविद्यालय में पढाई के बजाय ठेकेदारी की प्रवृत्ति को बढावा दिया है। एक ऐसे शिक्षक को जो वाइस चांसलर के आने के पहले विभाग आता हो और आपके जाने के बाद विभाग छोड़ता हो उसे शिक्षक दिवस के मौके पर नोटिस दी जाती है कि वो छात्रों-छात्राओं और अध्यापकों को भडका रहे हैं। क्या विश्वविद्यालय के अध्यापकों का चरित्र इतना कमजोर है कि इतनी जल्दी उनको प्रभावित कर सकता है। जबकि वो शिक्षक केवल कंपाउण्डर है, ‘‘डाक्टर’’ भी नही। इतने बड़ी-बड़ी डिग्रियां और किताबे लिखने वाले अध्यापकगणों को कंपाउण्डर बहका सकता है तो इन शिक्षकों पर सवाल ही खडे होतें है। और उनके द्वारा लिखी गयी किताबों पर सवाल उठता है। क्या विश्वविद्यालय केवल पेपर लिखने वाले पेपरमैनों (जिनके पास कोई चरित्र की विश्वसनीयता न हो)का गिरोह है? हमें बताने की जरुरत नही है कि शिक्षा चरित्र निर्माण एवं अपने विचारों पर चलने की एक पद्वति ही है। यही सोच ने हम विद्यार्थियों को हमारे गुरु के नेतृत्व में यात्रा करने को मजबूर किया है।विश्वविद्यालय में छात्रों को आंदोलित करके अर्दब में लेने का कुछ चंद शिक्षको का एक बड़ा इतिहास रहा है जो परिसर में छिपकर ठेके और कमाई के धंधे को पनपाने के लिए ऐसा करते रहे है। वे कभी सामने नही आते पर पेशे और धन के बल पर अपना आंदोलन चलाते है। वही हमारे शिक्षक हमारा नेतृत्व कर एक बहादुर और चरित्रवान शिक्षक होने परिचय दिया है कि कोई भी लड़ाई हम मिलकर लड़ेगे और अपनी नौकरी और जानमाल को इन तथाकथित मठाधीशों से लड़ने में लगा देंगे। ये समय ही बतायेगा की वीसी के सरकारी लाव-लश्कर हमारे विचारों को जंजीरों को बांध पायेगे। इनकी पदोन्नति और सेलेक्शन कमेटी का लालच कितना हमको तोड़ पायेगा। परिसर में आज भी अधिकतर अध्यापक और विधार्थी ईमानदार और निष्ठावान हैं, जिनके बल पर हम निजीकरण के खिलाफ सै़द्धांतिक लड़ाई लडने का हौंसला कर पाये।

ये विश्वविद्यालय का ऐतिहासिक मौका था जब शिक्षक खुद आंदोलन का नेतृत्व करने को निकला था। प्रशासन ने ‘‘पीस जोन’’ की ‘‘मर्यादा’’ भंग करने के लिए अध्यापक को ही नोटिस दी हम छात्रों को क्यों नही? क्या हमारे अध्यापक इतने लल्लू हैं? क्या आप हमसे डरते हैं? क्या आपके अंदर नैतिक बल का आभाव है? आप राजनीति शास्त्र के ही प्रोफेसर हैं? आज हम देखेंगे कि आप की राजनीति हमारे नैतिक आंदोलन को किस हद तक तोड़ पाती है। आप विचारों के शिक्षक हैं व्यवहार के नही। आप एक आतंकवादी हैं जो अपनी कुर्सी और पद का आतंक दिखा कर लोगों को अपने विचारों पर अडिग रहने से रोकना चाहते हैं। हम लोग मिलकर दिखाएंगे की हम बिकाऊ नहीं हैं। जिन्हें आपके जैसे शिक्षा के तथाकथित मठाधीश और ठेकेदार खरीदकर तोड़ सकते हैं। देखेंगे जीत हमारे नैतिक बल की होगी या संगीनों के साये में जीने वाले आप जैसे तथाकथित शिक्षक की। जब चार दिनों से सैकड़ों लड़के-लड़कियां सड़कों पर खुली धूप और गर्मी में अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे थे। वहीं आप हमारे परिवार के मुखिया होकर वातानुकूलित चैंबर में जीके राय के साथ घंटों बैठकर राय मशविरा कर रहे है। आपको चार साल के कार्यकाल में शायद न मालुम हो पाया हो कि जीके राय वे अध्यापक हैं जिन्होंने जिंदगी भर कभी क्लास नहीं ली। इस सच को विश्वविद्यालय में सभी लोग जानते हैं। हमारे वो चार साल पहले वाले वीसी साहब कहां हैं जो हर मंच पर चढ़कर आदर्श टीचर बनने की दुहाई देते थे। चार साल में इतना विरोधाभास क्यूं? ये सब हम ‘‘नादान बच्चों’’ को दिखता है तो हम बोलते हैं लेकिन शायद शिक्षक इसलिए नहीं बोलते हैं क्योंकि वो हमसे ज्यादा समझदार और दुनिंयादार हैं। क्यों आप जैसे ज्ञानी-विज्ञानी महापुरुषों को दिखाई नहीं देता। आप महाभारत के धृतराष्ट्र की तरह सत्ता के नशे में इतने चूर न हो जायें कि पांडवों को हस्तिनापुर के बीस गांव न देने की जिद के बाद अपने सौ पुत्रों और राज्य को स्वाहा कर दिया। पत्रकारिता विभाग छोटा हो सकता है, भले वहां केवल एक शिक्षक हो, परन्तु हम विद्यार्थियों के हौसले इतने बुलंद है और हममे वो नैतिक बल है कि इस जीके राय की इस्टीट्यूट प्रोफेशनल स्टडीज की सोने की लंका को जलाकर खाक कर डालने का दम है। आप अपनी राजनीति की गोट खेलते रहे हम अपनी लड़ाई लड़ते रहेंगे। आप अपने षडयंत्र रचिए, विजय तो योद्वाओं की ही होगी। हम वो लोग हैं जो अपने माथे पर काले कफन डालकर अपने विचारों और सिद्वातों के लिए खड़े हैं न कि आपके पैरों पर लोटने वाले विश्वविद्यालय के वो अध्यापक जो लाख टका की तनख्वाह होने के बावजूद विश्वविद्यालय की ईंट खाते हैं, सीमेंट फंाकतें है, कम्प्यूटर चबाते है और सब कुछ हजम करने के बाद चटनी-अचार-मुरब्बा खिलाकर व्यवहार बनाते हैं। ये लगभग सवा़ सौ साल पुराना विश्वविद्यालय शिक्षा का केंद्र है न कि व्यवसायिक केंद्र। यहां न्याय और अधिकारों की आयत पढ़ी जाती है और इंसाफ के मंत्रो का जाप होता है। कुलपति महोदय, आपसे विनम्र निवेदन है कि शिक्षक को अपनी जायज मांगें उठाने के लिए नोटिस देकर अपना वैचारिक दिवालियापन दिखाने के बजाय हमारे मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करे। आप हमें बतांए कि आखिर किस अधिकार के तहत समानान्तर कोर्स को एक्जीक्यूटिव काउंसिल से पास किए बिना मीडिया स्टडीज का पाठ्यक्रम कैसे चालू कर रहे हैं। क्योंकि एक्जीक्यूटिव काउंसिल से पास न होने के चलते ही एमए (मास कम्यूनिकेशन) विभाग दो साल तक बंद रहा। आखिर आप हमारे साथ इतना सौतेला व्यवहार क्यों कर रहे हैं। आपका इसमें क्या निजी हित और राजनीति है? कृपया यह राजनीति के प्रोफेसर बताएं। - आपके अपने

पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के विद्यार्थी

निजीकरण विरोधी आंदोलन को मिल रहा भारी समर्थन

- बरसात में भी डटे रहे विद्यार्थी
- कुलपति की बुद्धि-शुद्धी के लिए यज्ञ की तैयारी

इलाहाबाद 7 सितम्बर 09/ दिनभर बरसात के बीच पत्रकारिता विभाग के छात्रों ने पूरे कैंपस में घूम-घूम कर अपने निजीकरण विरोधी आंदोलन के पक्ष में समर्थन मांगा। अपनी मांगों पर पांच दिन बीतने के बाद भी जवाब न देने पर छात्रों ने कुलपति के नाम खुला खत जारी कर पूरे विश्वविद्यालय में वितरित किया।पत्रकारिता विभाग द्वारा शुरु किया गया आंदोलन आज पांचवे दिन भी जारी रहा। आज विभाग के सैकडों छात्रों ने बरसात में भीगते हुए विश्वविद्यालय कैंपस मंे आम छात्रों के बीच जाकर उनसे विश्वविद्यालय प्रशासन कि तानाशाही के खिलाफ खड़े होने के लिए समर्थन मांगा। इस कड़ी में हस्ताक्षर अभियान के तहत हजारों छात्रों ने बैनर पर हस्ताक्षर कर अपना समर्थन जताया। कुलपति द्वारा पत्रकारिता विभाग के समानान्तर स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रम चलाये जाने को जनविरोधी बताते हुए छात्रों ने इस तानाशाही पूर्ण रवैये की भत्र्सना की। छात्रों ने अपनी मांगो पर कुलपति द्वारा जवाब न देने पर कुलपति की बुद्धि विवेक की शुद्धि और अपने विभाग को बचाने के लिए कल आयोजित यज्ञ हेतू निमंत्रण पत्र बांटा। छात्रों ने कहा कि यज्ञ के माध्यम से विश्वविद्यालय के गौरवशाली अतीत और इसके स्वर्णिम भविष्य की कामना करेगें। इस यज्ञ में हम कुलपति की निजीकरण के कुत्सित विचारों को भस्मीभूत करेंगे। छात्रों ने इस यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए उन सभी को आमंत्रित किया है जो शिक्षा के बाजारीकरण और विश्वविद्यालय में डिग्री बांटने की दुकान खोले जाने के विरोध में खड़े होने का साहस रखते हैं।सैंकडों की संख्या में जुटे छात्र-छात्राओं ने अपने इस अभियान को शांतिपूर्ण तरीके से तब तक जारी रखने का संकल्प दोहराया जब तक विश्वविद्यालय प्रशासन मांगों को नही मानता।

समस्त विद्यार्थी

पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग

इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद

सम्पर्क -09307761822 09889646767 09454695369

13 सित॰ 2009

आन्दोलन की खबरें

4 सितम्बर,09
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पत्रकारिता एवं जन संचार विभाग के रहते उसके समानांतर स्ववित्तपोषित पत्रकारिता विभाग चलाने और शिक्षा के व्यवसायीकरण करने के खिलाफ आज भी विश्वविद्यालय का माहौल गरम रहा। एक बजे तक कक्षाएं लेने के बाद पत्रकारिता विभाग के सैकड़ो छात्रों ने काली पट्टी बाधे अपने प्राध्यापक सुनील उमराव के नेतृत्व में कला संकाय में मौन जुलूस निकाला और विभिन्न विभागों की दीवारों पर अपने ज्ञापन को चस्पा किया। बाद में अपने विभागाध्यक्ष और कला संकाय के डीन एनआर फारूकी से पत्रकारिता विभाग की उपेक्षा और विश्वविद्यालय में नये पत्रकारिता कोर्स के नाम पर हो रहे निजीकरण पर स्पष्टीकरण मांगा। छात्रों ने कला संकाय के सभी विभागों में जाकर छात्र-छात्राओं एंव प्राध्यापकों से अपने पत्रकारिता विभाग को बचाने और निजीकरण विरोधी अपने आन्दोलन के समर्थन में आने की गुजारिश की। विभाग के छात्रों ने सवाल उठाया कि विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के समानान्तर जो पत्रकारिता की दुकान खोली जा रही ह,ै आखिर उसमें कौन लोग पढ़ेंगें। जो डिग्री छात्रों को कुछ हजार रूपयों में मिल रही थी उसके लिए लाखों रूपये विश्वविद्यालय क्यों वसूलेगा। जबकि केन्द्रीय विश्वविद्यालय बनने के बाद विश्वविद्यालय के पास अधिक संसाधन हो गये हैं और वो छात्रों को ज्यादा सुविधा मुहैया करा सकता है। पर विश्वविद्यालय आम छात्रों को विश्वविद्यालय पहुुचने से वंचित करना चाहता है। इस सिलसिले में छात्र अपने विभागाध्यक्ष और कला संकाय के डीन प्रो एनआर फारूकी से मिले और एकेडमिक काउंसिल की उस मीटिंग, जिसमें स्ववित्तपोषित पत्रकारिता विभाग चलाने की बात की गयी थी, पर स्पष्टीकरण मांगा। घेराव के दौरान प्रो फारूकी बीच बचाव करते हुए निजीकरण के पक्ष में उतरे जिसका छात्रों ने कड़ा विरोध किया और सवाल किया कि जो विभागाध्यक्ष कभी विभाग नहीं आते हैं वो हमारे भविष्य का निर्धारण कैसे कर सकते हैं।
पत्रकारिता विभाग के छात्रों ने निर्णय लिया है कि जब तक विश्वविद्यालय पत्रकारिता की नई दुकान बीए इन मीडिया स्टडीज को बंद नहीं करता तबतक हमारा आंदोलन जारी रहेगा। कल शिक्षक दिवस के अवसर पर छात्र विभिन्न संकायांे में जाकर पत्रकारिता विभाग बचाने और विश्वविद्यालय में हो रहे निजीकरण विरोधी अपने आंदोलन के लिए अध्यापकों से समर्थन मांगेंगें और पर्चा बाटेंगे।
5सितम्बर,09
विश्वविद्यालय में पत्रकारिता एवं जन संचार विभाग के समानांतर स्ववित्तपोषित पत्रकारिता कोर्स चलये जाने के खिलाफ पत्रकारिता विभाग के छात्रों का आन्दोलन आज तीसरे दिन भी जारी रहा। शिक्षक दिवस के अवसर पर छात्रों ने आज कला संकाय और विज्ञान संकाय के अध्यापकों से विश्वविद्यालय में हो रहे व्यवसायीकरण एवं पत्रकारिता विभाग के समानान्तर स्ववित्तपोषित स्नातक कोर्स चलाए जाने के खिलाफ अपनी स्थिति स्पष्ट करने की मांग की। जिस पर लगभग दो दर्जन से अधिक शिक्षकों ने समनान्तर कोर्स चलाए जाने के विरोध में अपना समर्थन दिया। पत्रकारिता विभाग के सैकड़ो छात्रों ने आज अपनी कक्षा से छूटते ही प्लेकार्ड, काला झण्डा और हाथों में काली पट्टी बाधे एवं गुलाब का फूल लिए कला संकाय और विज्ञान संकाय के सभी शिक्षकों से मिले और उन्हें शिक्षक दिवस की बधाई दी। प्लेकार्डस पर ‘पत्रकारिता विभाग के समानान्तर स्ववित्तपोषित कोर्स क्यांे कुलपति जवाब दो तथा पत्रकारिता की निजी दुकान बन्द करो’ इत्यादि नारे लिखे थे। इस दौरान छात्रों ने अपनी 11 सूत्री मांगों का पर्चा भी वितरित किया। साथ ही छात्र विश्वविद्यालय के अन्य विभागों के अध्यापकों से मिले और अपने विभाग के समानान्तर स्ववित्तपोषित मीडिया की दुकान पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने की मांग की। जिस पर 22 शिक्षकों ने अपनी राय खुल कर रखी और आन्दोलन के पक्ष में हस्ताक्षर किया। और लगभग सैकड़ो शिक्षकों ने अप्रत्यक्ष रूप से आन्दोलन का समर्थन किया।इस दौरान छात्र कला संकाय के डीन प्रो एनआर फारूकी से भी मिले और उन्हें शिक्षक दिवस के दिन अपने प्राध्यापक को अपनी जायज मांगो को उठानेे के लिए नोटिस देने पर धन्यवाद देते हुए गुलाब का फूल दिया। छात्रों ने व्यंग कसते हुए उनसे अपनी लड़ाई में सफल होने का आशीर्वाद मांगा। जिस पर उन्होंने इस लड़ाई में ही नहीं जीवन की हर लड़ाई में सफल होने का आशीर्वाद दिया। छात्रों का कहना है कि आखिर विश्वविद्यालय में जब सरकार द्वारा अकूत धन दिया जा रहा है, जिसमें से हर साल एक बड़ा हिस्सा वापस लौट जा रहा है तो ऐसे में व्यक्तिगत हितों के लिए सेल्फ फाइनेंस कोर्स आखिर क्यों चलाया जा रहे है। छात्रों का यह भी कहना था कि प्त्रकारिता की जो डिग्री विश्वविद्यालय दो साल में 14 हजार में दे रहा है उसके समानान्तर प्रस्तावित स्ववित्तपोषित कोर्स यही डिग्री सवा लाख रूपये में देगा। जिसे सिर्फ उच्च वर्ग के पैसे वाले लोग ही खरीद सकते हैं। इस दौरान छात्रों ने बु़द्धजीवियों सेे भी अपील की कि वे निजीदुकान मंे व्याख्यान देने जाने से बचे क्योंकि इससे निजी दुकानें चलाने वालों को वैधता हासिल होती है। छात्रों ने बताया कि आंदोलन सिर्फ एक विभाग को बचाने के लिए ही नहीं बल्कि प्त्रकारिता की जनपक्ष़्ाधर स्वरुप को बचाने के लिए है जो अपनी मांगों के पूरा होने तक चलता रहेगा। इस पूरे मुद्दे पर छात्र अजय ने सूचना अधिकार कानून के तहत तीन सवालों का जवाब भी मांगा है। जिसमें तुलनात्मक साहित्य विभाग के बंद किये जाने का कारण, पिछले 25 साल से पत्रकारिता विभाग में फैकेल्टी नियुक्ति के लिए यूजीसी मानकों के अनुसार किये गये पहल तथा ऐसे विभागों की जानकारी मांगी गयी है जिसमे यूजीसी के मानकोें को क्रियान्वित किये बिना ही शिक्षण कार्य चल रहा है।
6सितम्बर,09
पत्रकारिता विभाग के सैकडो़ं छात्रों ने पत्रकारिता विभाग की उपेक्षा और यूजीसी के मानदंडों के विपरीत विश्वविद्यालय में ही शुरु किये जा रहे सेल्फफायनेंस मीडिया अध्ययन के विरोध में डेलीगेसी और हास्टलों में हस्ताक्षर अभियान चलाया। पत्रकारिता विभाग के छात्रों के आंदोलन में शरीक शिक्षक सुनील उमराव को शिक्षक दिवस के दिन नोटिस जारी करने को अलोकतांत्रिक व तानाशाही पूर्ण कदम बताया।पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के छात्रों की अपने विभाग की उपेक्षा और विश्वविद्यालय में एक विभाग के समानान्तर दूसरी जगह अवैध रुप से चलाये जाने वाले पत्रकारिता कोर्स के विरोध में ंशुरु आंदोलन आज चैथे दिन भी जारी रहा। छात्रों ने कुलपति के मीडिया में दिये बयान कि पत्रकारिता विभाग के द्वारा जारी मुहिम छात्रों को भड़काने के साजिश है और इस कार्य के लिए विभाग के अध्यापक को दण्ड दिया जायेगा का विरोध किया। इस पर छात्रों ने कहा की कुलपति अगर किसी पर्चा लीक जैसी धांधली को छिपाने के लिए मार्च करते हैं तो वे उसे वे गलत नही मानते और छात्रों की जायज और तर्कसंगत मांग करने पर नोटिस जारी करते हैं। छात्रों ने इसे छात्र आंदोलन विरोधी विश्वविद्यालय का तानाशाही पूर्ण कदम बताया।सैकडों की संख्या में छात्र कटरा डेलीगेसी, जीएन झा हास्टल, पीसीबी और सर सुंदरलाल छात्रावास के छात्रों को इस अभियान से जोडा। हजारों की संख्या में छात्रों ने हस्ताक्षर कर सर्मथन जताते हुए कहा की केंद्रीय विश्वविद्यालय बनने के बाद अकूत धन आने के बावजूद भी अगर विश्वविद्यालय फर्जी दुकान खोलने से बाज नही आता तो सड़को पर उतरेगें। आंदोलन से जुडते हुए डेलीगेसी के छात्रों ने कहा कि आंदोलन सिर्फ एक विभाग को बचाने के लिए नही बल्कि पत्रकारिता के जनपक्षधर स्वरुप को बचाने के लिए है।छात्रों ने मांग की कुलपति नोटिस देने के बजाय स्पष्टीकरण दे की बगैर एक्जीक्यूटिव काउंसिल से पास हुए कोर्स में प्रवेश कैसे शुरु किया जा रहा है। जबकि पत्रकारिता विभाग के ही एमए कोर्स को एक्जीक्यूटिव कमेटी से पास न होने के चलते विभाग दो साल 2005 से 2007 तक बंद रखा गया। छात्रों ने सवाल किया कि जिस एकेडमिक काउंसिल से कार्स को एपू्रव होने की बात कह रहे है उसमें बीए मीडिया स्टडी कोर्स का प्रस्ताव रखने वाले व्यक्ति की विश्वविद्यालय में क्या अथारिटी है।छात्रों ने यूजीसी को विश्वविद्यालय का काला लेखा-जोखा भेजते हुए कहा की मांगे पूरी न होने तक आंदोलन चलता रहेगा।

निजीकरण से पहले कुछ जवाब चाहिए !

कुलपति,
डीन कला संकाय,
डीन विद्यार्थी कल्याण,
अध्यक्ष, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग,
विश्वविद्यालय के सभी अध्यापक गण एवं छात्र
यूजीसी के नियमों को ताक पर रखते हुए विश्वविद्यालय द्वारा पिछले 25 वर्षों से चल रहे पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के होते हुए भी, ‘मीडिया अध्ययन केन्द्र’ के रूप में एक नये व्यावसायिक संस्थान की स्थापना की जा रही है। इस व्यावसायिक संस्थान में स्ववित्तपोशित पाठ्यक्रम के रूप में बी।ए. (मीडिया अध्ययन) एवं कुछ अन्य सर्टिफिकेट व डिप्लोमा कोर्सेज प्रारम्भ किये जा रहे हैं। दरअसल यह ‘मीडिया अध्ययन केन्द्र’ फोटो जर्नलिज्म एण्ड विजुअल कम्युनिकेषन केन्द्र का ही नया मुखौटा है, जो अब तक एकवर्शीय स्ववित्तपोशित पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा कोर्स संचालित करता था । लेकिन आज पत्रकारिता विभाग को उपेक्षित कर समानान्तर कोर्स चलाने की कवायद चालू हो गयी है। यूजीसी द्वारा मान्य एम.ए. पत्रकारिता एवं जनसंचार पाठ्यक्रम संचालित करने वाले विभाग को छोड़कर उसके कार्य क्षेत्र में ही एक ही विश्वविद्यालय के अंदर बी.ए. मीडिया अध्ययन ;ठण्।ण् डमकपं ैजनकपमे द्ध के लिए दूसरे संस्थान एवं स्ववित्तपोशित पाठ्यक्रम की व्यवस्था समझ से परे है। इस सन्दर्भ में हम, विभाग के विद्यार्थी, कुलपति व विश्वविद्यालय प्रषासन से कुछ प्रष्न पूछना चाहते हैं और कुछ बिन्दुओं की ओर आपका ध्यान इंगित कराना चाहते हैं। 1. जब विश्वविद्यालय के अन्दर पहले से ही पत्रकारिता एवं जनसंचार का एक विभाग मौजूद है, जो एम.ए. कोर्स करा रहा है तो फिर बी.ए. मीडिया अध्ययन के रूप में विभाग के समानान्तर एक व्यावसायिक कोर्स किसी दूसरे केन्द्र या संस्थान में चलाने का क्या औचित्य है?2. ऐसे किसी पाठ्यक्रम का औचित्य तब और भी अधिक नहीं रह जाता, जब बी.ए. मीडिया अध्ययन का पाठ्यक्रम और बी.ए. पत्रकारिता एवं जनसंचार का पाठ्यक्रम यूजीसी द्वारा तय किये गये पाठ्यक्रम के समान है।3. क्या विश्वविद्यालय की प्रषाासनिक नीति नये षैक्षिक पाठ्यक्रमों की “ाुरूआत को लेकर इस बात से सहमत है कि ‘इंस्टीट्यूट आॅफ प्रोफेषनल स्टडीज’ किसी विभाग के समानान्तर बी.ए.@एम.ए। जैसे स्ववित्तपोशित कोर्स चला सकता है? यदि भविस्य में पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग अपना भी एक कोर्स “ाुरू करना चाहता है तो विश्वविद्यालय का क्या जवाब होगा? क्या विश्वविद्यालय एक ही पाठ्यक्रम की दो अलग ­अलग डिग्रियां बांटने की इजाजत देगा? इस बारे में विभागों के लिए क्या दिषानिर्देष हैं?4। विभागों के समानान्तर व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की ‘ाुरूआत से सम्बन्धित केन्द्रीय विश्वविद्यालय के क्या नियम हैं?5। क्या कोई केन्द्रीय विश्वविद्यालय ग्रेजुएषन, पोस्ट ग्रेजुएषन या डिप्लोमा पाठ्यक्रमों की “ाुरूआत विश्वविद्यालय नियमों के अन्तर्गत बिना स्थायी षिक्षकों की नियुक्ति के कर सकता है?6. हम विश्वविद्यालय के कुलपति से यह जानना चाहते हैं कि “ौक्षिक स्तर को ऊपर उठाने के जिस लक्ष्य की वो बात करते हैं, बिना स्थायी षिक्षकों के पाठ्यक्रमों की “ुरूआत करके वे इस दिषा में किस परिपाटी का निर्माण करना चाह रहे हैं?7. क्या कारण है कि विश्वविद्यालय प्रषासन द्वारा नियुक्तियों, कोश एवं अनुदानों के बंटवारे के सिलसिले में लगातार विभाग की अवहेलना की जाती है, मसलन* विभाग पिछले 20 सालों से सिर्फ एक स्थायी षिक्षक के द्वारा चलाया जा रहा है।* योजनागत एवं गैर योजनागत नियुक्तियों का कोई आवंटन क्यों नहीं हुआ? * यूजीसी की ग्यारहवीं योजना समिति के सामने विभाग को प्रस्तुति की अनुमति क्यों नहीं दी गई जबकि सभी नियम कायदों को दरकिनार करते हुए यूजीसी टीम को फोटो जर्नलिज्म विभाग का दौरा कराया गया?* जहां कुछ चुनिन्दा विभागों नियुक्ति हेतु चयन समिति का गठन होता है, वहीं पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग एवं इस जैसे अन्य विभागों की अनदेखी की जाती है?* जब विश्वविद्यालय विभाग की मूलभूत आवष्यकताओं जैसे कोश एवं शिक्षक इत्यादि की पूर्ति करने में पिछले पांच वर्शों से असफल रहा है, तब एक नये समानान्तर पाठ्यक्रम की “ाुरूआत के पीछे आखिर क्या तर्क हैं? आखिर ऐसी कौन सी नीतिगत मजबूरियां हैं जो कुलपति का कार्यकाल खत्म होने के ठीक पहले ही और कार्यकारिणी समिति द्वारा औपचारिक रूप से इस निर्णय की संस्तुति से पूर्व ही प्रेस­विज्ञप्ति देने एवं इस पाठ्यक्रम की प्रवेष प्रक्रिया “ाुरू करने हेतु बाध्य करती है?9. आखिर क्यों इंस्टीट्यूट आॅफ प्रोफेषनल स्टडीज को इतनी तत्परता से पत्रकारिता के डिग्री पाठ्यक्रम की आवष्यकता है? पत्रकारिता के क्षेत्र में “ौक्षणिक गुणवत्ता की वृहत् परिकल्पना में ये निर्णय क्या प्रयोजन सिद्ध करता है?10. “ौक्षिक समुदाय की जानकारी के लिए हम विनम्रतापूर्वक ये बताना चाहते हैं कि मीडिया अध्ययन मीडिया के समालोचनात्मक अध्ययन का क्षेत्र है, न कि मीडिया पेशेवरों के निर्माण का। जबकि उक्त पाठ्यक्रम मात्र मीडिया पेशेवरों के निर्माण के सम्बन्ध में ही बात करता है।11. क्या हमारी आशका सही नहीं है कि आने वाले समय में कोश, संसाधनों एवं नियुक्तियों के मामलों में हमारा हक भी इस तथाकथित इंस्टीट्यूट आॅफ प्रोफेषनल स्टडीज के हाथों हड़पा जायेगा, जबकि इसके निदेषक की कुलपति कार्यालय से घनिश्ठता सर्वविदित है।
अन्ततः हम माननीय कुलपति महोदय से अनुरोध करना चाहेंगे कि वे देश के विभिन्न केन्द्रीय विश्वविद्यालय से वरिष्ट मीडिया शिक्षाविदों की एक समिति का गठन करें जो कि इस मामले का गुणों के आधार पर निस्तारण करने में सक्षम हो। इससे कम कुछ भी विभाग एवं इसके विद्यार्थियों के विकास को अवरूद्ध करने का प्रयास माना जायेगा क्योंकि “ौक्षणिक परिषद् एवं कार्यकारिणी परिषद् दोनों में ही इस विषय से सम्बन्धित विषेशज्ञों का सर्वथा अभाव है।
समस्त विद्यार्थी
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, इलाहाबाद
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पत्रकारिता की पढाई निजी हाथों में देने का विरोध

- छात्र सड़क पर उतरे
इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के प़त्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के साथ विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा किये जा रहे दोहरे व्यवहार का आक्रोष आखिरकार आज फूट ही पड़ा। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पिछले 25 वर्षों सेचल रहे पत्रकारिता विभाग के बावजुूद विश्वविद्यालय प्रशासन ने परिसर में अलग से एक और ‘मीडिया अध्ययन केन्द्र’ के माध्यम से नये व्यावसायिक संस्थान की स्थापना कर दी है। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा विश्वविद्यालय का व्यावसायीकरण किये जाने के विरोध में एवं पहले से चल रहे पत्रकारिता विभाग के साथ हो रहे सौतेले व्यवहार के विरोध में पत्रकारिता विभाग के छात्रों ने परिसर में “ाांतिपूर्वक विरोध प्रदर्षन किया। इस दौरान छात्रों ने माथे पर काली पट्टी बांधकर व काले झंडे दिखाते हुए विश्वविद्यालय परिसर में मौन जुलूस निकाला। पत्रकारिता विभाग के षिक्षक सुनील उमराव की अगुवाई में छात्रों ने कला संकाय के डीन प्रो एनआर फारूकी एवं डीएस डब्ल्यू प्रो आरके सिंह सहित कुलपति प्रो आरजी हर्शे को ज्ञापन सौंपा एवं मीडिया अध्ययन केन्द्र के अंतर्गत “ाुरू किए जा रहे स्ववित्त पोशित बीए मीडिया अध्ययन कोर्स को समाप्त करने की मांग की। इस दौरान कुलपति से पत्रकारिता विभाग के अध्यापक सुनील उमराव और छात्रों की बातचीत भी हुई। जिसमें छात्रों की न्यायपूर्ण मांगो के प्रति कुलपति की प्रतिक्रिया पूरी तरह नकारात्मक रही और वार्ता के बीच ही कुलपति ने छात्रों की मांगो को अनावष्यक बताते हुए बातचीत करने से मना कर दिया। इससे नाराज छात्रों ने कुलपति सहित विश्वविद्यालय प्रशासन के इस तानाषाही रवैये के खिलाफ विश्वविद्यालय प्रशासन विरोधी नारे लगाते हुए गांधी भवन की ओर प्रस्थान किया। छात्र-छात्राओं का भारी समूह विश्वविद्यालय में चलाये जा रहे स्ववित्त पोशित पाठ्यक्रमों एवं शिक्षा के व्यावसायीकरण विरोधी तख्तियों को हाथो में लिए गांधी भवन पहुंचा, जहां सभी ने इस बात का संकल्प लिया कि जब तक विश्वविद्यालय प्रशासन हमारी सभी मांगों को नहीं मानता तब तक छात्रों का, छात्रों के लिए और छात्रों द्वारा ही चलाया जा रहा यह आंदोलन जारी रहेगा।