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14 सित॰ 2009

काला दिवस घोषित कर निकाला मौन जुलूस

- कार्टूनों के माध्यम से बाजारवादियों की करतूतों को उजागर किया
- माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के छात्र समर्थन में आए

इलाहाबाद 10 सितंबर 09/ आज विश्वविद्यालय प्रशासन ने आंदोलनों के दमन और छात्रों को आतंकित करने के लिए जहां एक ओर परिसर को संगीनों की छावनी में तब्दील कर दिया था तो वही निजीकरण विरोधी आंदोलन आज आठवें दिन भी जारी रहा। छात्रों ने गूंगे बहरे बाज़ारवादी विश्वविद्यालय प्रशासन की करतूतों को कार्टूनों के माध्यम से छात्रों के बीच जाकर उजागर किया।आज जहां पूरा विश्वविद्यालय प्रशासन आंदोलनों के दमन के लिए उतारु था तो वही पत्रकारिता विभाग के छात्रों ने काला दिवस घोषित करते हुए मौन जूलूस निकाला। छात्रों ने अपने हाथों में कार्टून बनी तख्तियां ली थी। जिस पर विश्वविद्यालय को दुकान बनाने वालों पर कटाक्ष किया गया था। पत्रकारिता के छात्रों नंे अपने विभाग को बचाने और निजीकरण विरोधी अपने आंदोलन को नया रुप देते हुए कार्टूनों का प्रदर्शन किया। छात्रों का जुलूस ‘‘कला संकाय’’ यूनिवर्सिटी रोड होते हुए ‘‘विज्ञान संकाय’’ पहुंचा। छात्रों ने कहा कि आज आठ दिन पूरे हो जाने पर भी कुलपति द्वारा जवाब न मिलने पर आंदोलन को नयी रचनात्मकता देते हुए कार्टूनों और स्लोगनों के माध्यम से हमने अपना प्रतिरोध दर्ज कराया। आज आंदोलन का समर्थन करने के लिए माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से जीतेश कुमार और विवेक मिश्रा के नेतृत्व में प्रतिनिधि मंडल इलाहाबाद पहुंचा। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई सिर्फ इलाहाबाद की नहीं बल्कि पूरे देश की लड़ाई है। सामाजिक कार्यकर्ता सीमा आजाद, आइसा के सचिव सुनील मौर्या और संध्या भी मौन जुलूस में शामिल हुए। आज पत्रकारिता विभाग के ’’ख़बरचैरा‘‘ पर लगे पोस्टरों को विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा उखाडे़ जाने को छात्रों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताते हुए कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन कर रहा है। उन्होंने कहा कि इस पर क्या कार्यवाही की जाएगी इसे आज बैठक कर निर्णय लिया जाएगा। ‘सवाल पूछते रहो’ अभियान तहत विभाग के छात्र लल्लू राम ने आज अपने विभागाध्यक्ष और कला संकाय के डीन एन आर फारुकी से पत्रकारिता विभाग की उपेक्षा और विभाग के प्रति उनकी उदासीनता से संबधित सवाल पूछे।

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छात्रनेताओं पर रासुका लगाने की कोशिश हास्यास्पद- पीयूसीएल

इलाहाबाद 10 सितम्बर 2009 / पीपुल्स यूनियन फाॅर सिविल लिबर्टीज पीयूसीएल ने इलाहाबाद विविश्वविद्यालय में छात्रसंघ बहाली का आंदोलन चला रहंे छात्र नेताओं के पुलिसिया दमन की कडी निंदा की है। पीयूसीएल के प्रदेश संघठन सचिव शाहनवाज आलम और राजीव यादव ने तत्काल छात्र नेताओं को रिहा करने और छात्रसंघ बहाल करने की मांग की है। नेताओं का कहना है कि छात्रसंघ चुनाव लोकतंत्र की नर्सरी हैैं। जिसके माध्यम से छात्र अपने जायज सवालों को उठाते हैं इसकी मांग करने वालों को दबाना सरकार के लोकतंत्र विरोधी चेहरे को उजागर करता है। छात्र नेताओं पर रासुका लगाने की तैयारी को विश्वविद्यालय प्रशासन की तानाशाही बताते हुए सवाल पूछा है कि अपनी जायज मांगे उठाना कौन से राष्ट्रीय सुरक्षा का़नून का उल्लंघन है। पूरे विश्वविद्यालय को पीस जोन के नाम पर जिस तरह छावनी में तब्दील कर दिया गया है उस पीस जोन को विश्वविद्यालय के किस एक्ट के तहत बनाया गया है? नेताओं ने विश्वविद्यालय के आस पास की चाय और पुस्तकों की दुकानों को पुलिस द्वारा तहस-नहस करने की आलोचना करते हुए कहा कि इसके दोषी अधिकारियों पर कार्यवाही करने की मांग की।

कुलपति (?) के नाम पत्रकारिता विभाग के विद्यार्थियों का खुला पत्र

महोदय,

आज से चंद साल पहले जब विश्वविद्यालय की प्रवेश परी़क्षा के पेपर लीक होने के सवाल पर आपने प्रशासन के लोगों को साथ लेकर गांधी भवन तक मार्च किया था, विश्वविद्यालय की अस्मिता और प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए तब केवल विश्वविद्यालय में चंद शिक्षक और कुछ ही प्रशासन के नुमाइंदे ही आपके साथ थे।

आज जब पत्रकारिता विभाग की अस्मिता और प्रतिष्ठा पर आंच आ रही है और तो वहां के शिक्षक अपने सभी विद्याथर््ीिओं के साथ उसी तरह गांधी भवन जाते हैं। ये संकल्प लेने के लिए की हम अपने मान सम्मान और विचारों पर अडिग रहेंगे तो आप उस विभाग के सात साल विभागाध्यक्ष रहे सुनील उमराव को नोटिस थमाते हैं कि वो परिसर में अराजकता फैला रहे हैं और वीसी के कथित मानसम्मान को ठेस पहुंचा रहे हैं। क्या आज वीसी का मानसम्मान एक विभाग या शिक्षक से अलग होता है? क्या विश्वविद्यालय जैसी अकादमिक संस्थाओं में विचारों को भैंस की तरह जंजीरों में बांधा जा सकता है। जब श्री राजेन हर्षे वीसी की कुर्सी की गरिमा को बनाये नही रख पा रहें है तो उस कुर्सी की गरिमा को यह कार्य कैसे आघात पहुंचा सकता है। सीनेट हाल में बच्चों की तरह पूरे विश्वविद्यालय के अध्यापकों द्वारा अपने को ‘‘हैप्पी बर्थडे टु यू’’ गवाकर विश्वविद्यालय की ऐतिहासिक गरिमा को ध्वस्त कर नया अध्याय लिखा है। क्या एक शिक्षक को अपने पदोन्नति और प्रशासनिक पदों की भूख इतनी वैचारिक अकाल पैदा करती है कि सभी एक सुर में हैप्पी बर्थ डे प्रायोजित करते है। यह विश्वविद्यालय में किस प्रकार की परिपाटी स्थापित करने की कोशिश की जा रही है।

राजेन हर्षे के कुलपति बनने के बाद हर मंच पर खड़े होकर यहां पर अकादमिक स्तर को बढाने की दुहाई देते रहे हैं और विश्वविद्यालय के ज्यादातर अध्यापकों पर न पढाने का आरोप लगाते रहे है परंतु व्यवहार में क्लास न लेने वाले शिक्षकों के इर्दगिर्द घिरे रहे है। और उनकी सलाह से विश्वविद्यालय में पढाई के बजाय ठेकेदारी की प्रवृत्ति को बढावा दिया है। एक ऐसे शिक्षक को जो वाइस चांसलर के आने के पहले विभाग आता हो और आपके जाने के बाद विभाग छोड़ता हो उसे शिक्षक दिवस के मौके पर नोटिस दी जाती है कि वो छात्रों-छात्राओं और अध्यापकों को भडका रहे हैं। क्या विश्वविद्यालय के अध्यापकों का चरित्र इतना कमजोर है कि इतनी जल्दी उनको प्रभावित कर सकता है। जबकि वो शिक्षक केवल कंपाउण्डर है, ‘‘डाक्टर’’ भी नही। इतने बड़ी-बड़ी डिग्रियां और किताबे लिखने वाले अध्यापकगणों को कंपाउण्डर बहका सकता है तो इन शिक्षकों पर सवाल ही खडे होतें है। और उनके द्वारा लिखी गयी किताबों पर सवाल उठता है। क्या विश्वविद्यालय केवल पेपर लिखने वाले पेपरमैनों (जिनके पास कोई चरित्र की विश्वसनीयता न हो)का गिरोह है? हमें बताने की जरुरत नही है कि शिक्षा चरित्र निर्माण एवं अपने विचारों पर चलने की एक पद्वति ही है। यही सोच ने हम विद्यार्थियों को हमारे गुरु के नेतृत्व में यात्रा करने को मजबूर किया है।विश्वविद्यालय में छात्रों को आंदोलित करके अर्दब में लेने का कुछ चंद शिक्षको का एक बड़ा इतिहास रहा है जो परिसर में छिपकर ठेके और कमाई के धंधे को पनपाने के लिए ऐसा करते रहे है। वे कभी सामने नही आते पर पेशे और धन के बल पर अपना आंदोलन चलाते है। वही हमारे शिक्षक हमारा नेतृत्व कर एक बहादुर और चरित्रवान शिक्षक होने परिचय दिया है कि कोई भी लड़ाई हम मिलकर लड़ेगे और अपनी नौकरी और जानमाल को इन तथाकथित मठाधीशों से लड़ने में लगा देंगे। ये समय ही बतायेगा की वीसी के सरकारी लाव-लश्कर हमारे विचारों को जंजीरों को बांध पायेगे। इनकी पदोन्नति और सेलेक्शन कमेटी का लालच कितना हमको तोड़ पायेगा। परिसर में आज भी अधिकतर अध्यापक और विधार्थी ईमानदार और निष्ठावान हैं, जिनके बल पर हम निजीकरण के खिलाफ सै़द्धांतिक लड़ाई लडने का हौंसला कर पाये।

ये विश्वविद्यालय का ऐतिहासिक मौका था जब शिक्षक खुद आंदोलन का नेतृत्व करने को निकला था। प्रशासन ने ‘‘पीस जोन’’ की ‘‘मर्यादा’’ भंग करने के लिए अध्यापक को ही नोटिस दी हम छात्रों को क्यों नही? क्या हमारे अध्यापक इतने लल्लू हैं? क्या आप हमसे डरते हैं? क्या आपके अंदर नैतिक बल का आभाव है? आप राजनीति शास्त्र के ही प्रोफेसर हैं? आज हम देखेंगे कि आप की राजनीति हमारे नैतिक आंदोलन को किस हद तक तोड़ पाती है। आप विचारों के शिक्षक हैं व्यवहार के नही। आप एक आतंकवादी हैं जो अपनी कुर्सी और पद का आतंक दिखा कर लोगों को अपने विचारों पर अडिग रहने से रोकना चाहते हैं। हम लोग मिलकर दिखाएंगे की हम बिकाऊ नहीं हैं। जिन्हें आपके जैसे शिक्षा के तथाकथित मठाधीश और ठेकेदार खरीदकर तोड़ सकते हैं। देखेंगे जीत हमारे नैतिक बल की होगी या संगीनों के साये में जीने वाले आप जैसे तथाकथित शिक्षक की। जब चार दिनों से सैकड़ों लड़के-लड़कियां सड़कों पर खुली धूप और गर्मी में अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे थे। वहीं आप हमारे परिवार के मुखिया होकर वातानुकूलित चैंबर में जीके राय के साथ घंटों बैठकर राय मशविरा कर रहे है। आपको चार साल के कार्यकाल में शायद न मालुम हो पाया हो कि जीके राय वे अध्यापक हैं जिन्होंने जिंदगी भर कभी क्लास नहीं ली। इस सच को विश्वविद्यालय में सभी लोग जानते हैं। हमारे वो चार साल पहले वाले वीसी साहब कहां हैं जो हर मंच पर चढ़कर आदर्श टीचर बनने की दुहाई देते थे। चार साल में इतना विरोधाभास क्यूं? ये सब हम ‘‘नादान बच्चों’’ को दिखता है तो हम बोलते हैं लेकिन शायद शिक्षक इसलिए नहीं बोलते हैं क्योंकि वो हमसे ज्यादा समझदार और दुनिंयादार हैं। क्यों आप जैसे ज्ञानी-विज्ञानी महापुरुषों को दिखाई नहीं देता। आप महाभारत के धृतराष्ट्र की तरह सत्ता के नशे में इतने चूर न हो जायें कि पांडवों को हस्तिनापुर के बीस गांव न देने की जिद के बाद अपने सौ पुत्रों और राज्य को स्वाहा कर दिया। पत्रकारिता विभाग छोटा हो सकता है, भले वहां केवल एक शिक्षक हो, परन्तु हम विद्यार्थियों के हौसले इतने बुलंद है और हममे वो नैतिक बल है कि इस जीके राय की इस्टीट्यूट प्रोफेशनल स्टडीज की सोने की लंका को जलाकर खाक कर डालने का दम है। आप अपनी राजनीति की गोट खेलते रहे हम अपनी लड़ाई लड़ते रहेंगे। आप अपने षडयंत्र रचिए, विजय तो योद्वाओं की ही होगी। हम वो लोग हैं जो अपने माथे पर काले कफन डालकर अपने विचारों और सिद्वातों के लिए खड़े हैं न कि आपके पैरों पर लोटने वाले विश्वविद्यालय के वो अध्यापक जो लाख टका की तनख्वाह होने के बावजूद विश्वविद्यालय की ईंट खाते हैं, सीमेंट फंाकतें है, कम्प्यूटर चबाते है और सब कुछ हजम करने के बाद चटनी-अचार-मुरब्बा खिलाकर व्यवहार बनाते हैं। ये लगभग सवा़ सौ साल पुराना विश्वविद्यालय शिक्षा का केंद्र है न कि व्यवसायिक केंद्र। यहां न्याय और अधिकारों की आयत पढ़ी जाती है और इंसाफ के मंत्रो का जाप होता है। कुलपति महोदय, आपसे विनम्र निवेदन है कि शिक्षक को अपनी जायज मांगें उठाने के लिए नोटिस देकर अपना वैचारिक दिवालियापन दिखाने के बजाय हमारे मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करे। आप हमें बतांए कि आखिर किस अधिकार के तहत समानान्तर कोर्स को एक्जीक्यूटिव काउंसिल से पास किए बिना मीडिया स्टडीज का पाठ्यक्रम कैसे चालू कर रहे हैं। क्योंकि एक्जीक्यूटिव काउंसिल से पास न होने के चलते ही एमए (मास कम्यूनिकेशन) विभाग दो साल तक बंद रहा। आखिर आप हमारे साथ इतना सौतेला व्यवहार क्यों कर रहे हैं। आपका इसमें क्या निजी हित और राजनीति है? कृपया यह राजनीति के प्रोफेसर बताएं। - आपके अपने

पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के विद्यार्थी

निजीकरण विरोधी आंदोलन को मिल रहा भारी समर्थन

- बरसात में भी डटे रहे विद्यार्थी
- कुलपति की बुद्धि-शुद्धी के लिए यज्ञ की तैयारी

इलाहाबाद 7 सितम्बर 09/ दिनभर बरसात के बीच पत्रकारिता विभाग के छात्रों ने पूरे कैंपस में घूम-घूम कर अपने निजीकरण विरोधी आंदोलन के पक्ष में समर्थन मांगा। अपनी मांगों पर पांच दिन बीतने के बाद भी जवाब न देने पर छात्रों ने कुलपति के नाम खुला खत जारी कर पूरे विश्वविद्यालय में वितरित किया।पत्रकारिता विभाग द्वारा शुरु किया गया आंदोलन आज पांचवे दिन भी जारी रहा। आज विभाग के सैकडों छात्रों ने बरसात में भीगते हुए विश्वविद्यालय कैंपस मंे आम छात्रों के बीच जाकर उनसे विश्वविद्यालय प्रशासन कि तानाशाही के खिलाफ खड़े होने के लिए समर्थन मांगा। इस कड़ी में हस्ताक्षर अभियान के तहत हजारों छात्रों ने बैनर पर हस्ताक्षर कर अपना समर्थन जताया। कुलपति द्वारा पत्रकारिता विभाग के समानान्तर स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रम चलाये जाने को जनविरोधी बताते हुए छात्रों ने इस तानाशाही पूर्ण रवैये की भत्र्सना की। छात्रों ने अपनी मांगो पर कुलपति द्वारा जवाब न देने पर कुलपति की बुद्धि विवेक की शुद्धि और अपने विभाग को बचाने के लिए कल आयोजित यज्ञ हेतू निमंत्रण पत्र बांटा। छात्रों ने कहा कि यज्ञ के माध्यम से विश्वविद्यालय के गौरवशाली अतीत और इसके स्वर्णिम भविष्य की कामना करेगें। इस यज्ञ में हम कुलपति की निजीकरण के कुत्सित विचारों को भस्मीभूत करेंगे। छात्रों ने इस यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए उन सभी को आमंत्रित किया है जो शिक्षा के बाजारीकरण और विश्वविद्यालय में डिग्री बांटने की दुकान खोले जाने के विरोध में खड़े होने का साहस रखते हैं।सैंकडों की संख्या में जुटे छात्र-छात्राओं ने अपने इस अभियान को शांतिपूर्ण तरीके से तब तक जारी रखने का संकल्प दोहराया जब तक विश्वविद्यालय प्रशासन मांगों को नही मानता।

समस्त विद्यार्थी

पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग

इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद

सम्पर्क -09307761822 09889646767 09454695369

13 सित॰ 2009

आन्दोलन की खबरें

4 सितम्बर,09
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पत्रकारिता एवं जन संचार विभाग के रहते उसके समानांतर स्ववित्तपोषित पत्रकारिता विभाग चलाने और शिक्षा के व्यवसायीकरण करने के खिलाफ आज भी विश्वविद्यालय का माहौल गरम रहा। एक बजे तक कक्षाएं लेने के बाद पत्रकारिता विभाग के सैकड़ो छात्रों ने काली पट्टी बाधे अपने प्राध्यापक सुनील उमराव के नेतृत्व में कला संकाय में मौन जुलूस निकाला और विभिन्न विभागों की दीवारों पर अपने ज्ञापन को चस्पा किया। बाद में अपने विभागाध्यक्ष और कला संकाय के डीन एनआर फारूकी से पत्रकारिता विभाग की उपेक्षा और विश्वविद्यालय में नये पत्रकारिता कोर्स के नाम पर हो रहे निजीकरण पर स्पष्टीकरण मांगा। छात्रों ने कला संकाय के सभी विभागों में जाकर छात्र-छात्राओं एंव प्राध्यापकों से अपने पत्रकारिता विभाग को बचाने और निजीकरण विरोधी अपने आन्दोलन के समर्थन में आने की गुजारिश की। विभाग के छात्रों ने सवाल उठाया कि विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के समानान्तर जो पत्रकारिता की दुकान खोली जा रही ह,ै आखिर उसमें कौन लोग पढ़ेंगें। जो डिग्री छात्रों को कुछ हजार रूपयों में मिल रही थी उसके लिए लाखों रूपये विश्वविद्यालय क्यों वसूलेगा। जबकि केन्द्रीय विश्वविद्यालय बनने के बाद विश्वविद्यालय के पास अधिक संसाधन हो गये हैं और वो छात्रों को ज्यादा सुविधा मुहैया करा सकता है। पर विश्वविद्यालय आम छात्रों को विश्वविद्यालय पहुुचने से वंचित करना चाहता है। इस सिलसिले में छात्र अपने विभागाध्यक्ष और कला संकाय के डीन प्रो एनआर फारूकी से मिले और एकेडमिक काउंसिल की उस मीटिंग, जिसमें स्ववित्तपोषित पत्रकारिता विभाग चलाने की बात की गयी थी, पर स्पष्टीकरण मांगा। घेराव के दौरान प्रो फारूकी बीच बचाव करते हुए निजीकरण के पक्ष में उतरे जिसका छात्रों ने कड़ा विरोध किया और सवाल किया कि जो विभागाध्यक्ष कभी विभाग नहीं आते हैं वो हमारे भविष्य का निर्धारण कैसे कर सकते हैं।
पत्रकारिता विभाग के छात्रों ने निर्णय लिया है कि जब तक विश्वविद्यालय पत्रकारिता की नई दुकान बीए इन मीडिया स्टडीज को बंद नहीं करता तबतक हमारा आंदोलन जारी रहेगा। कल शिक्षक दिवस के अवसर पर छात्र विभिन्न संकायांे में जाकर पत्रकारिता विभाग बचाने और विश्वविद्यालय में हो रहे निजीकरण विरोधी अपने आंदोलन के लिए अध्यापकों से समर्थन मांगेंगें और पर्चा बाटेंगे।
5सितम्बर,09
विश्वविद्यालय में पत्रकारिता एवं जन संचार विभाग के समानांतर स्ववित्तपोषित पत्रकारिता कोर्स चलये जाने के खिलाफ पत्रकारिता विभाग के छात्रों का आन्दोलन आज तीसरे दिन भी जारी रहा। शिक्षक दिवस के अवसर पर छात्रों ने आज कला संकाय और विज्ञान संकाय के अध्यापकों से विश्वविद्यालय में हो रहे व्यवसायीकरण एवं पत्रकारिता विभाग के समानान्तर स्ववित्तपोषित स्नातक कोर्स चलाए जाने के खिलाफ अपनी स्थिति स्पष्ट करने की मांग की। जिस पर लगभग दो दर्जन से अधिक शिक्षकों ने समनान्तर कोर्स चलाए जाने के विरोध में अपना समर्थन दिया। पत्रकारिता विभाग के सैकड़ो छात्रों ने आज अपनी कक्षा से छूटते ही प्लेकार्ड, काला झण्डा और हाथों में काली पट्टी बाधे एवं गुलाब का फूल लिए कला संकाय और विज्ञान संकाय के सभी शिक्षकों से मिले और उन्हें शिक्षक दिवस की बधाई दी। प्लेकार्डस पर ‘पत्रकारिता विभाग के समानान्तर स्ववित्तपोषित कोर्स क्यांे कुलपति जवाब दो तथा पत्रकारिता की निजी दुकान बन्द करो’ इत्यादि नारे लिखे थे। इस दौरान छात्रों ने अपनी 11 सूत्री मांगों का पर्चा भी वितरित किया। साथ ही छात्र विश्वविद्यालय के अन्य विभागों के अध्यापकों से मिले और अपने विभाग के समानान्तर स्ववित्तपोषित मीडिया की दुकान पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने की मांग की। जिस पर 22 शिक्षकों ने अपनी राय खुल कर रखी और आन्दोलन के पक्ष में हस्ताक्षर किया। और लगभग सैकड़ो शिक्षकों ने अप्रत्यक्ष रूप से आन्दोलन का समर्थन किया।इस दौरान छात्र कला संकाय के डीन प्रो एनआर फारूकी से भी मिले और उन्हें शिक्षक दिवस के दिन अपने प्राध्यापक को अपनी जायज मांगो को उठानेे के लिए नोटिस देने पर धन्यवाद देते हुए गुलाब का फूल दिया। छात्रों ने व्यंग कसते हुए उनसे अपनी लड़ाई में सफल होने का आशीर्वाद मांगा। जिस पर उन्होंने इस लड़ाई में ही नहीं जीवन की हर लड़ाई में सफल होने का आशीर्वाद दिया। छात्रों का कहना है कि आखिर विश्वविद्यालय में जब सरकार द्वारा अकूत धन दिया जा रहा है, जिसमें से हर साल एक बड़ा हिस्सा वापस लौट जा रहा है तो ऐसे में व्यक्तिगत हितों के लिए सेल्फ फाइनेंस कोर्स आखिर क्यों चलाया जा रहे है। छात्रों का यह भी कहना था कि प्त्रकारिता की जो डिग्री विश्वविद्यालय दो साल में 14 हजार में दे रहा है उसके समानान्तर प्रस्तावित स्ववित्तपोषित कोर्स यही डिग्री सवा लाख रूपये में देगा। जिसे सिर्फ उच्च वर्ग के पैसे वाले लोग ही खरीद सकते हैं। इस दौरान छात्रों ने बु़द्धजीवियों सेे भी अपील की कि वे निजीदुकान मंे व्याख्यान देने जाने से बचे क्योंकि इससे निजी दुकानें चलाने वालों को वैधता हासिल होती है। छात्रों ने बताया कि आंदोलन सिर्फ एक विभाग को बचाने के लिए ही नहीं बल्कि प्त्रकारिता की जनपक्ष़्ाधर स्वरुप को बचाने के लिए है जो अपनी मांगों के पूरा होने तक चलता रहेगा। इस पूरे मुद्दे पर छात्र अजय ने सूचना अधिकार कानून के तहत तीन सवालों का जवाब भी मांगा है। जिसमें तुलनात्मक साहित्य विभाग के बंद किये जाने का कारण, पिछले 25 साल से पत्रकारिता विभाग में फैकेल्टी नियुक्ति के लिए यूजीसी मानकों के अनुसार किये गये पहल तथा ऐसे विभागों की जानकारी मांगी गयी है जिसमे यूजीसी के मानकोें को क्रियान्वित किये बिना ही शिक्षण कार्य चल रहा है।
6सितम्बर,09
पत्रकारिता विभाग के सैकडो़ं छात्रों ने पत्रकारिता विभाग की उपेक्षा और यूजीसी के मानदंडों के विपरीत विश्वविद्यालय में ही शुरु किये जा रहे सेल्फफायनेंस मीडिया अध्ययन के विरोध में डेलीगेसी और हास्टलों में हस्ताक्षर अभियान चलाया। पत्रकारिता विभाग के छात्रों के आंदोलन में शरीक शिक्षक सुनील उमराव को शिक्षक दिवस के दिन नोटिस जारी करने को अलोकतांत्रिक व तानाशाही पूर्ण कदम बताया।पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के छात्रों की अपने विभाग की उपेक्षा और विश्वविद्यालय में एक विभाग के समानान्तर दूसरी जगह अवैध रुप से चलाये जाने वाले पत्रकारिता कोर्स के विरोध में ंशुरु आंदोलन आज चैथे दिन भी जारी रहा। छात्रों ने कुलपति के मीडिया में दिये बयान कि पत्रकारिता विभाग के द्वारा जारी मुहिम छात्रों को भड़काने के साजिश है और इस कार्य के लिए विभाग के अध्यापक को दण्ड दिया जायेगा का विरोध किया। इस पर छात्रों ने कहा की कुलपति अगर किसी पर्चा लीक जैसी धांधली को छिपाने के लिए मार्च करते हैं तो वे उसे वे गलत नही मानते और छात्रों की जायज और तर्कसंगत मांग करने पर नोटिस जारी करते हैं। छात्रों ने इसे छात्र आंदोलन विरोधी विश्वविद्यालय का तानाशाही पूर्ण कदम बताया।सैकडों की संख्या में छात्र कटरा डेलीगेसी, जीएन झा हास्टल, पीसीबी और सर सुंदरलाल छात्रावास के छात्रों को इस अभियान से जोडा। हजारों की संख्या में छात्रों ने हस्ताक्षर कर सर्मथन जताते हुए कहा की केंद्रीय विश्वविद्यालय बनने के बाद अकूत धन आने के बावजूद भी अगर विश्वविद्यालय फर्जी दुकान खोलने से बाज नही आता तो सड़को पर उतरेगें। आंदोलन से जुडते हुए डेलीगेसी के छात्रों ने कहा कि आंदोलन सिर्फ एक विभाग को बचाने के लिए नही बल्कि पत्रकारिता के जनपक्षधर स्वरुप को बचाने के लिए है।छात्रों ने मांग की कुलपति नोटिस देने के बजाय स्पष्टीकरण दे की बगैर एक्जीक्यूटिव काउंसिल से पास हुए कोर्स में प्रवेश कैसे शुरु किया जा रहा है। जबकि पत्रकारिता विभाग के ही एमए कोर्स को एक्जीक्यूटिव कमेटी से पास न होने के चलते विभाग दो साल 2005 से 2007 तक बंद रखा गया। छात्रों ने सवाल किया कि जिस एकेडमिक काउंसिल से कार्स को एपू्रव होने की बात कह रहे है उसमें बीए मीडिया स्टडी कोर्स का प्रस्ताव रखने वाले व्यक्ति की विश्वविद्यालय में क्या अथारिटी है।छात्रों ने यूजीसी को विश्वविद्यालय का काला लेखा-जोखा भेजते हुए कहा की मांगे पूरी न होने तक आंदोलन चलता रहेगा।

निजीकरण से पहले कुछ जवाब चाहिए !

कुलपति,
डीन कला संकाय,
डीन विद्यार्थी कल्याण,
अध्यक्ष, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग,
विश्वविद्यालय के सभी अध्यापक गण एवं छात्र
यूजीसी के नियमों को ताक पर रखते हुए विश्वविद्यालय द्वारा पिछले 25 वर्षों से चल रहे पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के होते हुए भी, ‘मीडिया अध्ययन केन्द्र’ के रूप में एक नये व्यावसायिक संस्थान की स्थापना की जा रही है। इस व्यावसायिक संस्थान में स्ववित्तपोशित पाठ्यक्रम के रूप में बी।ए. (मीडिया अध्ययन) एवं कुछ अन्य सर्टिफिकेट व डिप्लोमा कोर्सेज प्रारम्भ किये जा रहे हैं। दरअसल यह ‘मीडिया अध्ययन केन्द्र’ फोटो जर्नलिज्म एण्ड विजुअल कम्युनिकेषन केन्द्र का ही नया मुखौटा है, जो अब तक एकवर्शीय स्ववित्तपोशित पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा कोर्स संचालित करता था । लेकिन आज पत्रकारिता विभाग को उपेक्षित कर समानान्तर कोर्स चलाने की कवायद चालू हो गयी है। यूजीसी द्वारा मान्य एम.ए. पत्रकारिता एवं जनसंचार पाठ्यक्रम संचालित करने वाले विभाग को छोड़कर उसके कार्य क्षेत्र में ही एक ही विश्वविद्यालय के अंदर बी.ए. मीडिया अध्ययन ;ठण्।ण् डमकपं ैजनकपमे द्ध के लिए दूसरे संस्थान एवं स्ववित्तपोशित पाठ्यक्रम की व्यवस्था समझ से परे है। इस सन्दर्भ में हम, विभाग के विद्यार्थी, कुलपति व विश्वविद्यालय प्रषासन से कुछ प्रष्न पूछना चाहते हैं और कुछ बिन्दुओं की ओर आपका ध्यान इंगित कराना चाहते हैं। 1. जब विश्वविद्यालय के अन्दर पहले से ही पत्रकारिता एवं जनसंचार का एक विभाग मौजूद है, जो एम.ए. कोर्स करा रहा है तो फिर बी.ए. मीडिया अध्ययन के रूप में विभाग के समानान्तर एक व्यावसायिक कोर्स किसी दूसरे केन्द्र या संस्थान में चलाने का क्या औचित्य है?2. ऐसे किसी पाठ्यक्रम का औचित्य तब और भी अधिक नहीं रह जाता, जब बी.ए. मीडिया अध्ययन का पाठ्यक्रम और बी.ए. पत्रकारिता एवं जनसंचार का पाठ्यक्रम यूजीसी द्वारा तय किये गये पाठ्यक्रम के समान है।3. क्या विश्वविद्यालय की प्रषाासनिक नीति नये षैक्षिक पाठ्यक्रमों की “ाुरूआत को लेकर इस बात से सहमत है कि ‘इंस्टीट्यूट आॅफ प्रोफेषनल स्टडीज’ किसी विभाग के समानान्तर बी.ए.@एम.ए। जैसे स्ववित्तपोशित कोर्स चला सकता है? यदि भविस्य में पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग अपना भी एक कोर्स “ाुरू करना चाहता है तो विश्वविद्यालय का क्या जवाब होगा? क्या विश्वविद्यालय एक ही पाठ्यक्रम की दो अलग ­अलग डिग्रियां बांटने की इजाजत देगा? इस बारे में विभागों के लिए क्या दिषानिर्देष हैं?4। विभागों के समानान्तर व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की ‘ाुरूआत से सम्बन्धित केन्द्रीय विश्वविद्यालय के क्या नियम हैं?5। क्या कोई केन्द्रीय विश्वविद्यालय ग्रेजुएषन, पोस्ट ग्रेजुएषन या डिप्लोमा पाठ्यक्रमों की “ाुरूआत विश्वविद्यालय नियमों के अन्तर्गत बिना स्थायी षिक्षकों की नियुक्ति के कर सकता है?6. हम विश्वविद्यालय के कुलपति से यह जानना चाहते हैं कि “ौक्षिक स्तर को ऊपर उठाने के जिस लक्ष्य की वो बात करते हैं, बिना स्थायी षिक्षकों के पाठ्यक्रमों की “ुरूआत करके वे इस दिषा में किस परिपाटी का निर्माण करना चाह रहे हैं?7. क्या कारण है कि विश्वविद्यालय प्रषासन द्वारा नियुक्तियों, कोश एवं अनुदानों के बंटवारे के सिलसिले में लगातार विभाग की अवहेलना की जाती है, मसलन* विभाग पिछले 20 सालों से सिर्फ एक स्थायी षिक्षक के द्वारा चलाया जा रहा है।* योजनागत एवं गैर योजनागत नियुक्तियों का कोई आवंटन क्यों नहीं हुआ? * यूजीसी की ग्यारहवीं योजना समिति के सामने विभाग को प्रस्तुति की अनुमति क्यों नहीं दी गई जबकि सभी नियम कायदों को दरकिनार करते हुए यूजीसी टीम को फोटो जर्नलिज्म विभाग का दौरा कराया गया?* जहां कुछ चुनिन्दा विभागों नियुक्ति हेतु चयन समिति का गठन होता है, वहीं पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग एवं इस जैसे अन्य विभागों की अनदेखी की जाती है?* जब विश्वविद्यालय विभाग की मूलभूत आवष्यकताओं जैसे कोश एवं शिक्षक इत्यादि की पूर्ति करने में पिछले पांच वर्शों से असफल रहा है, तब एक नये समानान्तर पाठ्यक्रम की “ाुरूआत के पीछे आखिर क्या तर्क हैं? आखिर ऐसी कौन सी नीतिगत मजबूरियां हैं जो कुलपति का कार्यकाल खत्म होने के ठीक पहले ही और कार्यकारिणी समिति द्वारा औपचारिक रूप से इस निर्णय की संस्तुति से पूर्व ही प्रेस­विज्ञप्ति देने एवं इस पाठ्यक्रम की प्रवेष प्रक्रिया “ाुरू करने हेतु बाध्य करती है?9. आखिर क्यों इंस्टीट्यूट आॅफ प्रोफेषनल स्टडीज को इतनी तत्परता से पत्रकारिता के डिग्री पाठ्यक्रम की आवष्यकता है? पत्रकारिता के क्षेत्र में “ौक्षणिक गुणवत्ता की वृहत् परिकल्पना में ये निर्णय क्या प्रयोजन सिद्ध करता है?10. “ौक्षिक समुदाय की जानकारी के लिए हम विनम्रतापूर्वक ये बताना चाहते हैं कि मीडिया अध्ययन मीडिया के समालोचनात्मक अध्ययन का क्षेत्र है, न कि मीडिया पेशेवरों के निर्माण का। जबकि उक्त पाठ्यक्रम मात्र मीडिया पेशेवरों के निर्माण के सम्बन्ध में ही बात करता है।11. क्या हमारी आशका सही नहीं है कि आने वाले समय में कोश, संसाधनों एवं नियुक्तियों के मामलों में हमारा हक भी इस तथाकथित इंस्टीट्यूट आॅफ प्रोफेषनल स्टडीज के हाथों हड़पा जायेगा, जबकि इसके निदेषक की कुलपति कार्यालय से घनिश्ठता सर्वविदित है।
अन्ततः हम माननीय कुलपति महोदय से अनुरोध करना चाहेंगे कि वे देश के विभिन्न केन्द्रीय विश्वविद्यालय से वरिष्ट मीडिया शिक्षाविदों की एक समिति का गठन करें जो कि इस मामले का गुणों के आधार पर निस्तारण करने में सक्षम हो। इससे कम कुछ भी विभाग एवं इसके विद्यार्थियों के विकास को अवरूद्ध करने का प्रयास माना जायेगा क्योंकि “ौक्षणिक परिषद् एवं कार्यकारिणी परिषद् दोनों में ही इस विषय से सम्बन्धित विषेशज्ञों का सर्वथा अभाव है।
समस्त विद्यार्थी
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, इलाहाबाद
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पत्रकारिता की पढाई निजी हाथों में देने का विरोध

- छात्र सड़क पर उतरे
इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के प़त्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के साथ विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा किये जा रहे दोहरे व्यवहार का आक्रोष आखिरकार आज फूट ही पड़ा। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पिछले 25 वर्षों सेचल रहे पत्रकारिता विभाग के बावजुूद विश्वविद्यालय प्रशासन ने परिसर में अलग से एक और ‘मीडिया अध्ययन केन्द्र’ के माध्यम से नये व्यावसायिक संस्थान की स्थापना कर दी है। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा विश्वविद्यालय का व्यावसायीकरण किये जाने के विरोध में एवं पहले से चल रहे पत्रकारिता विभाग के साथ हो रहे सौतेले व्यवहार के विरोध में पत्रकारिता विभाग के छात्रों ने परिसर में “ाांतिपूर्वक विरोध प्रदर्षन किया। इस दौरान छात्रों ने माथे पर काली पट्टी बांधकर व काले झंडे दिखाते हुए विश्वविद्यालय परिसर में मौन जुलूस निकाला। पत्रकारिता विभाग के षिक्षक सुनील उमराव की अगुवाई में छात्रों ने कला संकाय के डीन प्रो एनआर फारूकी एवं डीएस डब्ल्यू प्रो आरके सिंह सहित कुलपति प्रो आरजी हर्शे को ज्ञापन सौंपा एवं मीडिया अध्ययन केन्द्र के अंतर्गत “ाुरू किए जा रहे स्ववित्त पोशित बीए मीडिया अध्ययन कोर्स को समाप्त करने की मांग की। इस दौरान कुलपति से पत्रकारिता विभाग के अध्यापक सुनील उमराव और छात्रों की बातचीत भी हुई। जिसमें छात्रों की न्यायपूर्ण मांगो के प्रति कुलपति की प्रतिक्रिया पूरी तरह नकारात्मक रही और वार्ता के बीच ही कुलपति ने छात्रों की मांगो को अनावष्यक बताते हुए बातचीत करने से मना कर दिया। इससे नाराज छात्रों ने कुलपति सहित विश्वविद्यालय प्रशासन के इस तानाषाही रवैये के खिलाफ विश्वविद्यालय प्रशासन विरोधी नारे लगाते हुए गांधी भवन की ओर प्रस्थान किया। छात्र-छात्राओं का भारी समूह विश्वविद्यालय में चलाये जा रहे स्ववित्त पोशित पाठ्यक्रमों एवं शिक्षा के व्यावसायीकरण विरोधी तख्तियों को हाथो में लिए गांधी भवन पहुंचा, जहां सभी ने इस बात का संकल्प लिया कि जब तक विश्वविद्यालय प्रशासन हमारी सभी मांगों को नहीं मानता तब तक छात्रों का, छात्रों के लिए और छात्रों द्वारा ही चलाया जा रहा यह आंदोलन जारी रहेगा।