साथियों,
शिक्षा के बाजारीकरण के खिलाफ जन आन्दोलनों के राष्ट्रिय समन्वय (एनएपीएम) ने एक ऑन लाइन पिटीशन जारी किया है। मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित आंदोलनकारी डॉ संदीप पांडे की ओर जारी इस पिटीशन में उन्होंने कहा है की शिक्षा बाजारू उत्पाद नहीं है। इलाहबाद विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के समान्तर बी ए इन मीडिया स्टडीज की निजी दुकान खोली जा रही है। अपील में छात्र आन्दोलन का समर्थन करते हुए कुलपति राजेन हर्षे से मुख्य कोर्स को ही पर्याप्त फंड उपलब्ध करने की मांग की गई है. एनएपीएम के इस आभियान से आप भी जुड़े और आन्दोलन को मजबूती प्रदान करे.
National Alliance of People's Movements (NAPM)
SIGN-the-PETITION: Against privatization of education agenda
[To read the Hindi language memorandum drafted by protesting Allahabad University students, click here ]
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To sign-the-signature petition campaign, please click here or go to: http://www.petitiononline.com/19919119/petition.html
Dear friends,
The decision of Prof Rajan Harshe, Vice Chancellor, Allahabad University, to launch a self-financed B।A। in Media Studies programme through the in-house Institute for Profession Studies (IPS) in spite of the presence of an independent Department of Journalism and Mass Communication in Allahabad University has invoked strong protest from the students, faculty and intellectuals outside. The objective of IPS was to generate resources for Allahabad University. But since Allahabad University (AU) has become a central university, it is not even able to utilize its full grant for the year.
We believe education is not a market commodity and abovementioned initiative of Prof Rajan Harshe, is privatization of education at the cost of diluting quality and demoralizing an already existing Department by floating a parallel programme.
We urge Prof Rajan Harshe to resist the temptation of privatization and strengthen the mainstream programmes with central funding available to him.
We support the ongoing struggle on and outside the campus of Allahabad University (AU) against privatization of education and express solidarity with the struggling students and faculty members on campus.
We request you all to consider signing the petition (to sign-the-signature petition campaign, please click here) in support of the struggle in Allahabad against privatisation of education agenda.
Sincerely,
Dr. Sandeep Pandey
National Alliance of People's Movements (NAPM)
To sign-the-signature petition campaign, please click here or go to: http://www.petitiononline.com/19919119/petition.html
To read the Hindi language memorandum drafted by protesting Allahabad University students, click here or go to: http://hindi-cns.blogspot.com/2009/09/blog-post_21.html
21 सित॰ 2009
20 सित॰ 2009
शिक्षा की ‘मंडी’ के खिलाफ महाभारत जरूरी
संतोष कुमार राय
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पहले से चले आ रहे पत्रकारिता के एक पाठ्यक्रम के समानान्तर एक और पाठ्यक्रम को मान्यता दिए जाने का विरोध हो रहा है। कुछ लोग मान्यता देने को सही ठहरा रहे हैं तो कुछ लोगों के गले नहीं उतर रहा कि ये कैसे हो सकता है? तकनीकि पहलुओं को छोड़ दें तो शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ यहां जो आंदोलन चल रहा है, उसका समर्थन उचित है। शिक्षण संस्थानों को मंडी बनने से रोकना होगा। ग्लैमर का चस्का देकर मोटी रकम वसूलकर उत्पाद पैदा करने वाले संस्थानों का विरोध करना होगा। यह शिक्षा के लिए बेहतर है और छात्र हित में है। ये संस्थान उत्पाद पैदा करने वाली फैक्ट्री बन गए हैं। इनसे सरोकार की उम्मीद बेमानी है। छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ न होने देने के लिए विरोध जरूरी है। क्यों जरूरी है, जानने के लिए आगे पढ़ें।
देशभर के विश्वविद्यालयों, कॉलेजों, पत्रकारिता विश्वविद्यालय, मुक्त विश्वविद्यालयों से पत्रकारिता का कोर्स करके हर साल हजार से ऊपर डिप्लोमा और डिग्रीधारी निकल रहे हैं। इसके अलावा बड़े शहरों में पत्रकारिता की डिग्री, डिप्लोमा देने वाले संस्थान गली-गली में खुल गए हैं। इन संस्थानों में छह महीने से साल भर के कोर्स के लिए डेढ़ से ढाई लाख रुपये से ऊपर लिए जाते हैं। दुख की बात ये है कि ज्यादातर संस्थानों में प्रिंट या इलेक्ट्रानिक पत्रकारिता के नाम पर पत्रकारिता का इतिहास बताकर खानापूर्ति कर दी जाती है। इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता की शिक्षा देने के लिए उनके पास बुनियादी संसाधन भी उपलब्ध नहीं है। आप अनुमान लगा सकते हैं कि देश में कितने (संख्या हजारों में) और किस गुणवत्ता के पत्रकारिता के डिग्रीधारी मीडिया संस्थानों में नौकरी के लिए आ रहे हैं।
किसी ने कहा था एक पत्रकार मरता है तो नए पत्रकार के लिए जगह खाली होती है। इसका तात्पर्य यही है कि इस क्षेत्र में बहुत कम जगह है। अब तो कई मीडिया संस्थान खुद पत्रकारिता की डिग्री, डिप्लोमा देने लगे हैं। वो सबसे पहले अपने यहां के छात्रों को नौकरी देते हैं। यानी बाकी शहरों से आने वाले पत्रकारिता छात्रों के लिए कई दरवाजे पहले से ही बंद हैं। एक नया न्यूज चैनल कितने लोगों को नौकरी दे सकता है ? अगर राष्ट्रीय स्तर का कोई नया न्यूज चैनल है तो ज्यादा से ज्यादा दो से ढाई सौ लोगों की जरूरत पड़ती है। उसमें ज्यादातर अनुभव वाले लोगों को ही लिया जाता है। नए लोगों को इन मीडिया संस्थानों में जगह पाने का अनुमान 10 फीसदी से ज्यादा नहीं है। लेकिन गली-गली में कुकुरमुत्ते की तरह उग आये इन मीडिया संस्थानों को पत्रकारिता की शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थियों से कोई सरोकार नहीं है। बस लाखों रुपये लेकर अपनी झोली भरते हैं। वास्तविक स्थिति से अवगत नहीं कराते। कहा जाता है मीडिया पढ़े-लिखों का क्षेत्र है लेकिन अब तो 10+2 के बाद ही पत्रकारिता का डिप्लोमा देने वाले संस्थानों की बाढ़ सी आ गई है। एंकर, रिपोर्टर और प्रोड्यूसर बनने का ख्वाब लेकर आने वाले ये लोग कहां फिट बैठेंगे ? ये मान्यता प्राप्त निजी संस्थान पत्रकारिता की व्यवहारिक शिक्षा देने की बजाय इस बात पर जोर देते हैं कि हर सत्र में मीडिया से जुड़ा कोई नाम एक दिन के लिए ही सही भाषण देने आ जाए। वो भी पैसा खाकर आता है चमक- दमक का बखान करता है और अंत में कह जाता है-मेहनत करोगे तो नौकरी जरूर मिलेगी। इस मेहनत का व्यवहारिक स्वरूप क्या हो कोई नहीं बताता।
मेरे बारे में : मैं एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल से जुड़ा हूं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की डिग्री लेकर नौकरी की तलाश में आज से पांच साल पहले दिल्ली आया । मेहनत करने की क्षमता और रुचि के कारण मेरे गुरुओं ने मुझे दिल्ली जाने का दबाव डाला था। मैं उन पत्रकारिता प्रशिक्षुओं की तरह था जिनका इस क्षेत्र में या कहें किसी भी क्षेत्र में ऊंचे ओहदे पर कोई नहीं था। सो संघर्ष करने के सिवाय कोई चारा नहीं था। तीन चार महीने के बाद यूएनआई में इंटर्नशिप करने का मौका मिला। एक महीने बाद दिल्ली ब्यूरो ईटीवी में इंटर्नशिप का मौका मिला। फिर सड़क पर गया। नौकरी की उम्मीद तो दूर-दूर तक नहीं थी। तीन-चार महीने के अंतराल के बाद एक बड़े मीडिया संस्थान में इंटर्नशिप का मौका मिला। उसी दौरान संयोग से वहां इंटरव्यू हुआ। इंटर्नशिप करते-करते इतनी जानकारी हो गई थी टेलीविजन में काम करना आसान लग रहा था यही नहीं कई तो मुझसे कम जानकारी वाले भी थे जिन्हें अच्छी सैलरी मिल रही थी। उम्मीद जगी कि इंटरव्यू में तो होना निश्चित है। इंटर्नशिप खत्म हुई। रिजल्ट के इंतजार में छह महीने से ज्यादा का वक्त बीत गया। इस बीच लगता था किसी भी दिन फोन आ जाएगा और कहा जाएगा आपकी नौकरी लग गई आकर ज्वाइन कर लीजिए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। काफी इंतजार के बाद फिर एक नए मीडिया संस्थान में अवैतनिक काम करने का मौका मिला। कहा गया था कि अगर आप अच्छा काम करेंगे तो नौकरी मिल सकती है। अब तक ऐसी स्थिति में आ गया था कि बुलेटिन निकाल सकता था, प्रोग्राम प्रोड्यूस कर सकता था। इतनी बड़ी जिम्मेदारी के बाद भी नौकरी नहीं थी। घर से पैसे मंगाकर दिल्ली में रहकर दूसरे के लिए काम कर रहा था और हमारी मेहनत से वो अपनी झोली भर रहा था।
13 महीने तक अनवरत सेवा देने के बाद इस संस्थान में मुझे नौकरी मिल गई। यहां काम करते हुए मुझे वेतन कितना मिल रहा था ये नहीं बताऊंगा क्योंकि आप भी शरमा जाएंगे। यानि दो साल तक काफी दिक्कतें उठाने के बाद जाकर नौकरी मिली थी। आर्थिक रूप से कितनी परेशानी हुई इसका जिक्र करने का कोई मतलब नहीं है। मानसिक रूप से कितना परेशान हो गया था खुद के बल पर नौकरी तलासेंगे तो पता चलेगा। मेरी सलाह है कि लगन और रुचि हो और आज के महौल में इससे ज्यादा मुसीबत मोल लेने की हिम्मत हो तो पत्रकारिता के पेशे में आएं।
मैने पांच हजार रुपये फीस में विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की डिग्री हासिल की थी। यहां पैसे से नहीं बल्कि उन लोगों को प्रवेश मिला था जो कड़ी प्रवेश परीक्षा पास करके आए थे। उनमें मेहनत करने की क्षमता थी पत्रकारिता का जज्बा था। यहां अमीर और गरीब दोनों ही पृष्ठभूमि के छात्र थे। यह मंडी नहीं बल्कि वास्तविक अर्थों में एक शिक्षण संस्थान था, शायद अब भी है।
संतोष कुमार राय इ.वि.वि. पत्रकारिता विभाग के छात्र रहे हैं और इन दिनों एक नेशनल न्यूज चैनल में कार्यरत हैं। उनसे संपर्क santosh.18.rai@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।
साभार भड़ास4मीडिया
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पहले से चले आ रहे पत्रकारिता के एक पाठ्यक्रम के समानान्तर एक और पाठ्यक्रम को मान्यता दिए जाने का विरोध हो रहा है। कुछ लोग मान्यता देने को सही ठहरा रहे हैं तो कुछ लोगों के गले नहीं उतर रहा कि ये कैसे हो सकता है? तकनीकि पहलुओं को छोड़ दें तो शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ यहां जो आंदोलन चल रहा है, उसका समर्थन उचित है। शिक्षण संस्थानों को मंडी बनने से रोकना होगा। ग्लैमर का चस्का देकर मोटी रकम वसूलकर उत्पाद पैदा करने वाले संस्थानों का विरोध करना होगा। यह शिक्षा के लिए बेहतर है और छात्र हित में है। ये संस्थान उत्पाद पैदा करने वाली फैक्ट्री बन गए हैं। इनसे सरोकार की उम्मीद बेमानी है। छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ न होने देने के लिए विरोध जरूरी है। क्यों जरूरी है, जानने के लिए आगे पढ़ें।
देशभर के विश्वविद्यालयों, कॉलेजों, पत्रकारिता विश्वविद्यालय, मुक्त विश्वविद्यालयों से पत्रकारिता का कोर्स करके हर साल हजार से ऊपर डिप्लोमा और डिग्रीधारी निकल रहे हैं। इसके अलावा बड़े शहरों में पत्रकारिता की डिग्री, डिप्लोमा देने वाले संस्थान गली-गली में खुल गए हैं। इन संस्थानों में छह महीने से साल भर के कोर्स के लिए डेढ़ से ढाई लाख रुपये से ऊपर लिए जाते हैं। दुख की बात ये है कि ज्यादातर संस्थानों में प्रिंट या इलेक्ट्रानिक पत्रकारिता के नाम पर पत्रकारिता का इतिहास बताकर खानापूर्ति कर दी जाती है। इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता की शिक्षा देने के लिए उनके पास बुनियादी संसाधन भी उपलब्ध नहीं है। आप अनुमान लगा सकते हैं कि देश में कितने (संख्या हजारों में) और किस गुणवत्ता के पत्रकारिता के डिग्रीधारी मीडिया संस्थानों में नौकरी के लिए आ रहे हैं।
किसी ने कहा था एक पत्रकार मरता है तो नए पत्रकार के लिए जगह खाली होती है। इसका तात्पर्य यही है कि इस क्षेत्र में बहुत कम जगह है। अब तो कई मीडिया संस्थान खुद पत्रकारिता की डिग्री, डिप्लोमा देने लगे हैं। वो सबसे पहले अपने यहां के छात्रों को नौकरी देते हैं। यानी बाकी शहरों से आने वाले पत्रकारिता छात्रों के लिए कई दरवाजे पहले से ही बंद हैं। एक नया न्यूज चैनल कितने लोगों को नौकरी दे सकता है ? अगर राष्ट्रीय स्तर का कोई नया न्यूज चैनल है तो ज्यादा से ज्यादा दो से ढाई सौ लोगों की जरूरत पड़ती है। उसमें ज्यादातर अनुभव वाले लोगों को ही लिया जाता है। नए लोगों को इन मीडिया संस्थानों में जगह पाने का अनुमान 10 फीसदी से ज्यादा नहीं है। लेकिन गली-गली में कुकुरमुत्ते की तरह उग आये इन मीडिया संस्थानों को पत्रकारिता की शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थियों से कोई सरोकार नहीं है। बस लाखों रुपये लेकर अपनी झोली भरते हैं। वास्तविक स्थिति से अवगत नहीं कराते। कहा जाता है मीडिया पढ़े-लिखों का क्षेत्र है लेकिन अब तो 10+2 के बाद ही पत्रकारिता का डिप्लोमा देने वाले संस्थानों की बाढ़ सी आ गई है। एंकर, रिपोर्टर और प्रोड्यूसर बनने का ख्वाब लेकर आने वाले ये लोग कहां फिट बैठेंगे ? ये मान्यता प्राप्त निजी संस्थान पत्रकारिता की व्यवहारिक शिक्षा देने की बजाय इस बात पर जोर देते हैं कि हर सत्र में मीडिया से जुड़ा कोई नाम एक दिन के लिए ही सही भाषण देने आ जाए। वो भी पैसा खाकर आता है चमक- दमक का बखान करता है और अंत में कह जाता है-मेहनत करोगे तो नौकरी जरूर मिलेगी। इस मेहनत का व्यवहारिक स्वरूप क्या हो कोई नहीं बताता।
मेरे बारे में : मैं एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल से जुड़ा हूं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की डिग्री लेकर नौकरी की तलाश में आज से पांच साल पहले दिल्ली आया । मेहनत करने की क्षमता और रुचि के कारण मेरे गुरुओं ने मुझे दिल्ली जाने का दबाव डाला था। मैं उन पत्रकारिता प्रशिक्षुओं की तरह था जिनका इस क्षेत्र में या कहें किसी भी क्षेत्र में ऊंचे ओहदे पर कोई नहीं था। सो संघर्ष करने के सिवाय कोई चारा नहीं था। तीन चार महीने के बाद यूएनआई में इंटर्नशिप करने का मौका मिला। एक महीने बाद दिल्ली ब्यूरो ईटीवी में इंटर्नशिप का मौका मिला। फिर सड़क पर गया। नौकरी की उम्मीद तो दूर-दूर तक नहीं थी। तीन-चार महीने के अंतराल के बाद एक बड़े मीडिया संस्थान में इंटर्नशिप का मौका मिला। उसी दौरान संयोग से वहां इंटरव्यू हुआ। इंटर्नशिप करते-करते इतनी जानकारी हो गई थी टेलीविजन में काम करना आसान लग रहा था यही नहीं कई तो मुझसे कम जानकारी वाले भी थे जिन्हें अच्छी सैलरी मिल रही थी। उम्मीद जगी कि इंटरव्यू में तो होना निश्चित है। इंटर्नशिप खत्म हुई। रिजल्ट के इंतजार में छह महीने से ज्यादा का वक्त बीत गया। इस बीच लगता था किसी भी दिन फोन आ जाएगा और कहा जाएगा आपकी नौकरी लग गई आकर ज्वाइन कर लीजिए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। काफी इंतजार के बाद फिर एक नए मीडिया संस्थान में अवैतनिक काम करने का मौका मिला। कहा गया था कि अगर आप अच्छा काम करेंगे तो नौकरी मिल सकती है। अब तक ऐसी स्थिति में आ गया था कि बुलेटिन निकाल सकता था, प्रोग्राम प्रोड्यूस कर सकता था। इतनी बड़ी जिम्मेदारी के बाद भी नौकरी नहीं थी। घर से पैसे मंगाकर दिल्ली में रहकर दूसरे के लिए काम कर रहा था और हमारी मेहनत से वो अपनी झोली भर रहा था।
13 महीने तक अनवरत सेवा देने के बाद इस संस्थान में मुझे नौकरी मिल गई। यहां काम करते हुए मुझे वेतन कितना मिल रहा था ये नहीं बताऊंगा क्योंकि आप भी शरमा जाएंगे। यानि दो साल तक काफी दिक्कतें उठाने के बाद जाकर नौकरी मिली थी। आर्थिक रूप से कितनी परेशानी हुई इसका जिक्र करने का कोई मतलब नहीं है। मानसिक रूप से कितना परेशान हो गया था खुद के बल पर नौकरी तलासेंगे तो पता चलेगा। मेरी सलाह है कि लगन और रुचि हो और आज के महौल में इससे ज्यादा मुसीबत मोल लेने की हिम्मत हो तो पत्रकारिता के पेशे में आएं।
मैने पांच हजार रुपये फीस में विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की डिग्री हासिल की थी। यहां पैसे से नहीं बल्कि उन लोगों को प्रवेश मिला था जो कड़ी प्रवेश परीक्षा पास करके आए थे। उनमें मेहनत करने की क्षमता थी पत्रकारिता का जज्बा था। यहां अमीर और गरीब दोनों ही पृष्ठभूमि के छात्र थे। यह मंडी नहीं बल्कि वास्तविक अर्थों में एक शिक्षण संस्थान था, शायद अब भी है।
संतोष कुमार राय इ.वि.वि. पत्रकारिता विभाग के छात्र रहे हैं और इन दिनों एक नेशनल न्यूज चैनल में कार्यरत हैं। उनसे संपर्क santosh.18.rai@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।
साभार भड़ास4मीडिया
शिक्षा नीति पर श्वेत पत्र लाये सरकार !
सुशांत झा
मैं ऐसी घटनाएं देखकर भौंचक्का हो जाता हूं। एक तरफ सरकार कहती है कि वो हर स्टेट में सेंट्रल यूनिवर्सिटीज का जाल बिछाएगी और माडेल कालेज खोलेगी लेकिन दूसरी तरफ प्राईवेट शिक्षा माफियाओं के लिए लाल कालीन बिछती है। अभी तक तो हमारे देश में बजट का 6 फीसदी ही शिक्षा पर नहीं जा रहा, दूसरी तरफ सरकार हजारो करोड़ का आंकड़ा दिखाकर कहती है कि हमने ये कर दिया। अरे खाक किया, 60 साल में आपने कुल जमा लगभग 450 यूनिवर्सिटीज बनाए हैं जिनमें से कई तो इस नाम पर कलंक है। सरकार ने कहा कि हम 30 सेंट्रल यूनिवर्सिटी खोलेंगे...जैसा हमारे ऊपर कोई एहसान हो रहा हो। हमारे देश में कई जगह 1-1, 2-2 करोड़ आबादी पर एक जेनेरल यूनिवर्सिटी है। लड़कियों के घर से ज्यादातर इलाकों में 15 किलोमीटर की दूरी पर एक कालेज है। बिहार में कमसे कम 5 किलोमीटर के दायरे में एक हाईस्कूल है-और सरकार है कि उसके नुमांइदे इलाहाबाद जैसी यूनिवर्सिटी में निजी माफियाओं को एफलिएसन दे रहे है। ऐसी सरकार से घिन आती है जो प्राईमरी एजुकेशन को महज आवश्यक मानकर अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़ रही है। सरकार ने हर गांव में सर्वशिक्षा अभियान के तहत 3000-4000 में शिक्षा मित्रों की बहाली कर हमें खैरात में अक्षर ज्ञान दिया है जैसे पुराने सम्राट अकाल के वक्त कुछ अनाज बांट देते थे।
सवाल यहां प्राईवेट एजुकेशन के विरोध का नहीं, बल्कि सरकार की मंशा का है। अब वक्त आ गया है कि हमारे देश में रेल बजट की तरह अलग से शिक्षा बजट जारी की जाए और जनता से उसकी राय पूछी जाए।
सरकार निजी शिक्षा पर एक साफ नीति बनाए, उस पर एक श्वेतपत्र जारी करे। गरीबों और वंचितों के लिए जबतक उसमें कोई संभावना नहीं होगी, तबतक वो हमें मान्य नहीं। ऐसा बहुत दिनों के बाद हुआ है कि इलाहाबाद से कोई युवा आवाज सामने आई है जो एक मुद्दे को लेकर है। देश में निजी शिक्षा को बढ़ावा देने के नाम पर ट्रस्टों, फाउंडेशनों और संस्थाओं के द्वारा जमीन की लूट जारी है दूसरी तरफ सरकार अपने संस्थानों द्वारा फीस की मनमानी नियम बनाकर इसमें भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रही है। हमें निजी शिक्षा से विरोध नहीं, विरोध इस बात से है कि सरकार अपना बजट क्यों नहीं बढ़ा रही है। वो सिर्फ आंकड़ा दिखती है, फीसदी नहीं बताती-न ही ये बताती है कि कितने लोगों को शिक्षा चाहिए और कौन जरुरतमंद है।
इलाहाबाद से शुऱु हुआ आंदोलन निश्चय ही एक नए बहस को जन्म देगा और बहरी सरकार को जगाएगा-हमें इसकी पूरी उम्मीद है।
(सुशांत झा आईआईएमसी के 2004-05 बैच के पासआउट हैं। इन दिनों वे एक निजी प्रोडक्शन कंपनी में कार्यरत हैं। उनसे संपर्क करने के लिए jhasushant@gmail.com का सहारा लिया जा सकता है।)
मैं ऐसी घटनाएं देखकर भौंचक्का हो जाता हूं। एक तरफ सरकार कहती है कि वो हर स्टेट में सेंट्रल यूनिवर्सिटीज का जाल बिछाएगी और माडेल कालेज खोलेगी लेकिन दूसरी तरफ प्राईवेट शिक्षा माफियाओं के लिए लाल कालीन बिछती है। अभी तक तो हमारे देश में बजट का 6 फीसदी ही शिक्षा पर नहीं जा रहा, दूसरी तरफ सरकार हजारो करोड़ का आंकड़ा दिखाकर कहती है कि हमने ये कर दिया। अरे खाक किया, 60 साल में आपने कुल जमा लगभग 450 यूनिवर्सिटीज बनाए हैं जिनमें से कई तो इस नाम पर कलंक है। सरकार ने कहा कि हम 30 सेंट्रल यूनिवर्सिटी खोलेंगे...जैसा हमारे ऊपर कोई एहसान हो रहा हो। हमारे देश में कई जगह 1-1, 2-2 करोड़ आबादी पर एक जेनेरल यूनिवर्सिटी है। लड़कियों के घर से ज्यादातर इलाकों में 15 किलोमीटर की दूरी पर एक कालेज है। बिहार में कमसे कम 5 किलोमीटर के दायरे में एक हाईस्कूल है-और सरकार है कि उसके नुमांइदे इलाहाबाद जैसी यूनिवर्सिटी में निजी माफियाओं को एफलिएसन दे रहे है। ऐसी सरकार से घिन आती है जो प्राईमरी एजुकेशन को महज आवश्यक मानकर अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़ रही है। सरकार ने हर गांव में सर्वशिक्षा अभियान के तहत 3000-4000 में शिक्षा मित्रों की बहाली कर हमें खैरात में अक्षर ज्ञान दिया है जैसे पुराने सम्राट अकाल के वक्त कुछ अनाज बांट देते थे।
सवाल यहां प्राईवेट एजुकेशन के विरोध का नहीं, बल्कि सरकार की मंशा का है। अब वक्त आ गया है कि हमारे देश में रेल बजट की तरह अलग से शिक्षा बजट जारी की जाए और जनता से उसकी राय पूछी जाए।
सरकार निजी शिक्षा पर एक साफ नीति बनाए, उस पर एक श्वेतपत्र जारी करे। गरीबों और वंचितों के लिए जबतक उसमें कोई संभावना नहीं होगी, तबतक वो हमें मान्य नहीं। ऐसा बहुत दिनों के बाद हुआ है कि इलाहाबाद से कोई युवा आवाज सामने आई है जो एक मुद्दे को लेकर है। देश में निजी शिक्षा को बढ़ावा देने के नाम पर ट्रस्टों, फाउंडेशनों और संस्थाओं के द्वारा जमीन की लूट जारी है दूसरी तरफ सरकार अपने संस्थानों द्वारा फीस की मनमानी नियम बनाकर इसमें भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रही है। हमें निजी शिक्षा से विरोध नहीं, विरोध इस बात से है कि सरकार अपना बजट क्यों नहीं बढ़ा रही है। वो सिर्फ आंकड़ा दिखती है, फीसदी नहीं बताती-न ही ये बताती है कि कितने लोगों को शिक्षा चाहिए और कौन जरुरतमंद है।
इलाहाबाद से शुऱु हुआ आंदोलन निश्चय ही एक नए बहस को जन्म देगा और बहरी सरकार को जगाएगा-हमें इसकी पूरी उम्मीद है।
(सुशांत झा आईआईएमसी के 2004-05 बैच के पासआउट हैं। इन दिनों वे एक निजी प्रोडक्शन कंपनी में कार्यरत हैं। उनसे संपर्क करने के लिए jhasushant@gmail.com का सहारा लिया जा सकता है।)
शिक्षा का बाज़ारीकरण रोकने के प्रति सरकार उदासीन - सुचेत गोइंदी
- शिक्षा के बाज़ारीकरण के विरोध में लोक राजनीति मंच और पत्रकारिता विभाग के छात्रों ने निकाला मौन जुलूस
- लोक राजनीति मंच आया पत्रकारिता विभाग के छात्रों के समर्थन में
इलाहाबाद 19 सितम्बर 2009 / लोक राजनीति मंच और पत्रकारिता विभाग के छात्रों द्वारा आज शिक्षा के बाजारीकरण और शिक्षा कानून अधिकार 2008 के विरोध में स्वराज विद्यापीठ से लेकर चन्द्रशेखर आजाद पार्क तक रैली निकाल कर राष्ट्रपति को प्रेषित ज्ञापन पढा गया।
पत्रकारिता विभाग के छात्रों द्वारा जारी आंदोलन के 16वंे दिन भी जारी है। आज देश में एक समान शिक्षा और सबको शिक्षा की मांग को लेकर लोक राजनीति मंच के प्रो कष्ण स्वरूप आनंदी, डा0 कष्ण मुरारी, डा0 श्री बल्लभ और शिक्षाश्री सम्मान प्राप्त डा0 सुचेत गोइंदी की अगुआई में छात्रों ने जुलूस निकाला। जुलूस में शामिल छात्र-छात्राओं ने शिक्षा के व्यापारीकरण के विरोध में ‘‘केरल हो या राजस्थान, सबकों शिक्षा एक समान’’, ‘‘गरीब हो या धनवान, सबको शिक्षा एक समान’’, ‘‘शिक्षा का बाज़ारीकरण बंद करो’’, ‘‘शिक्षा है सबका अधिकार बंद करो इसका व्यापार’’, आदि नारे लिखी तख्तियां लेकर मौन जुलूस निकाला। इस अवसर पर समाजसेविका डा0 सुचेत गोइंदी ने कहा कि सरकार कभी भी शिक्षा को लेकर गंभीर नही रही। सरकार को अब तत्काल शिक्षा के बाज़ारीकरण को बढ़ावा देने वाली नीतियों पर रोक लगानी चाहिए नही तो देश की आने वाली पीढ़ी को गंभीर परिणाम भुगतना पड़ेगा। सरकार को देश मंे एक समान शिक्षा प्रणाली लागू करनी चाहिए।
चंन्द्रशेखर आजाद की प्रतिमा के नीचे जुलूस में शामिल विद्यार्थियों और बुद्धिजीवी समाजसेवियों ने संकल्प लिया कि वे शिक्षा को आम आदमी की पहुंच से दूर करने की इस कोशिश को कामयाब नहीं होने देंगें। इस दौरान हुई सभा में वक्ताओं नें देश में एक समान शिक्षा प्रणाली की वकालत की। सभा में मौजूद प्रोफेसर कृष्ण स्वरुप आनंदी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के छात्रों की शिक्षा के बाज़ारीकरण के विरोध में शुरु किये गये आंदोलन की प्रशंसा करते हुए युवा छात्रों और पत्रकारों को भी इस मुहिम से जुड़ने की अपील की। इस सभा में पूर्व आइएएस श्रीराम यादव, पूर्व मुख्यन्यायाधीश रामभूषण मेहरोत्रा सहित पत्रकारिता विभाग के छात्र मौजूद रहे।
समस्त छात्र,
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद
9721446201,9889646767, 9455474188
- लोक राजनीति मंच आया पत्रकारिता विभाग के छात्रों के समर्थन में
पत्रकारिता विभाग के छात्रों द्वारा जारी आंदोलन के 16वंे दिन भी जारी है। आज देश में एक समान शिक्षा और सबको शिक्षा की मांग को लेकर लोक राजनीति मंच के प्रो कष्ण स्वरूप आनंदी, डा0 कष्ण मुरारी, डा0 श्री बल्लभ और शिक्षाश्री सम्मान प्राप्त डा0 सुचेत गोइंदी की अगुआई में छात्रों ने जुलूस निकाला। जुलूस में शामिल छात्र-छात्राओं ने शिक्षा के व्यापारीकरण के विरोध में ‘‘केरल हो या राजस्थान, सबकों शिक्षा एक समान’’, ‘‘गरीब हो या धनवान, सबको शिक्षा एक समान’’, ‘‘शिक्षा का बाज़ारीकरण बंद करो’’, ‘‘शिक्षा है सबका अधिकार बंद करो इसका व्यापार’’, आदि नारे लिखी तख्तियां लेकर मौन जुलूस निकाला। इस अवसर पर समाजसेविका डा0 सुचेत गोइंदी ने कहा कि सरकार कभी भी शिक्षा को लेकर गंभीर नही रही। सरकार को अब तत्काल शिक्षा के बाज़ारीकरण को बढ़ावा देने वाली नीतियों पर रोक लगानी चाहिए नही तो देश की आने वाली पीढ़ी को गंभीर परिणाम भुगतना पड़ेगा। सरकार को देश मंे एक समान शिक्षा प्रणाली लागू करनी चाहिए।
चंन्द्रशेखर आजाद की प्रतिमा के नीचे जुलूस में शामिल विद्यार्थियों और बुद्धिजीवी समाजसेवियों ने संकल्प लिया कि वे शिक्षा को आम आदमी की पहुंच से दूर करने की इस कोशिश को कामयाब नहीं होने देंगें। इस दौरान हुई सभा में वक्ताओं नें देश में एक समान शिक्षा प्रणाली की वकालत की। सभा में मौजूद प्रोफेसर कृष्ण स्वरुप आनंदी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के छात्रों की शिक्षा के बाज़ारीकरण के विरोध में शुरु किये गये आंदोलन की प्रशंसा करते हुए युवा छात्रों और पत्रकारों को भी इस मुहिम से जुड़ने की अपील की। इस सभा में पूर्व आइएएस श्रीराम यादव, पूर्व मुख्यन्यायाधीश रामभूषण मेहरोत्रा सहित पत्रकारिता विभाग के छात्र मौजूद रहे।समस्त छात्र,
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद
9721446201,9889646767, 9455474188
राष्ट्रपति/कुलाधिपति को प्रेषित ज्ञापन/ मांगपत्र
माननीय,
राष्ट्रपति/कुलाधिपति,
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद
पत्रकारिता विभाग के समानांतर एक और सेल्फ फायनेंस कोर्स चलाने और पत्रकारिता विभाग की उपेक्षा करने के संदर्भ मंे विभाग के छात्रों द्वारा प्रेषित मांगपत्र
महोदय/महोदया,
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के समानांतर एक और सेल्फ फायनेंस कोर्स चलाने और पत्रकारिता विभाग की उपेक्षा करने के संदर्भ मंे विभाग के छात्रों द्वारा विरोध प्रदर्शन के 15वें दिन विश्वविद्यालय के कुलपति को आंदोलन के पहले दिन 3 सितम्बर 2009 को सौंपी गयी हमारी मांगों के संदर्भ में आपकी तरफ से कोई जवाब न मिलने पर असंतोष लगातार बढ़ रहा है। हमारे आंदोलन को देशव्यापी जनसमर्थन मिल रहा है। राष्टीय हो चले इस आंदोलन का दायरा बढ़ने के कारण इस आंदोलन के जरिये उठायी गयी हमारी मांगों पर राष्टीयस्तर पर सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है। कृपया ध्यान दें हमारे पहले 3 सितग्बर को कुलपति महोदय इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद को सौंपा गया था, मांगपत्र में इन मांगो को सम्मिलित कर हमारी मांगे बिंदुवार निम्नवत हैं -
पिछले 25 साल से चल रहे पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग की लगातार उपेक्षा की गयी है। अब इस विभाग के लिए यूजीसी के निर्धारित मानदण्डों के अनुरुप संसाधन ( कम्प्यूटर लैब, आडियो-विडियों लैब, फोटोग्राफी डार्करुम, लाईब्रेरी, क्लासरुम, और स्थायी प्राध्यापक ) की व्यवस्था तत्काल प्रभाव से की जाय। ये व्यवस्था द्वितीय छमाही छमाही (सत्र 2009-10 के लिए ) की समाप्ती से पूर्व हो जानी चाहिए।
इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज के तहत इंस्टीट्यूट फाॅर फोटोजर्नलिज्म एण्ड विजुअल कम्यूनिकेशन में इसी सत्र (2009-10 सत्र) से शुरु किये जा रहे बीए इन मीडिया स्टडी के पाठ्यक्रम में प्रवेश पर तत्काल रोक लगाई जाय। अगर विश्वविद्यालय को स्नातक स्तर का ऐसा कोर्स चलाना है तो संबधित विभाग में ही पर्याप्त संसाधन की व्यवस्था करके ही चलाया जाय।
इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज की स्ववित्तपोषिता खत्म/समाप्त किया जाय। (राज्य स्तरीय विश्वविद्यालय 2005 में इसकी स्थापना के समय जिस उद्देश्य से इसे सृजित किया गया था, मसलन विश्वविद्यालय अपने लिए खुद संसाधन जुटायेंगे, की प्रासंगिकता अब समाप्तप्राय है क्योंकि केंद्रीय दर्जा पाने के बाद से विश्विद्यालय ने धन न खर्चकर पाने की वजह से वार्षिक अनुदान की धनराशि हर साल वापस लौटाई है।) अब इन सभी पाठ्यक्रमों की फीस न्यायसंगत एवं तर्कसंगत की जाय और छात्रों के उपर बोझ डालने के बजाय विश्वविद्यालय की बैंकों में जमापूंजी के ब्याज पर इन कोर्सों को चलाया जाय बाद में विश्वविद्यालय के बजट में प्रावधान किया जाय।
यूजीसी के मानको के अनुसार किसी भी विभाग/संस्था के अध्यक्ष/डायरेक्टर को प्रत्येक दो वर्षों पर रोटेट करने का निर्देश का पालन किया जाय। इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज के डायरेक्टर को भी इस नियम के दायरे में लाकर तत्काल प्रभाव से हटा कर नयी नियुक्ति की जाय। क्या वजह है कि इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज के डायरेक्टर को यूजीसी के मानकों के अनुसार रोटेट नही किया गया। क्या इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज यूजीसी के मानकों से परे है?
इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज चलाये रखने का तर्क संसाधनों के नाम पर दिया जाता है। विश्वविद्यालय के केेंद्रीय बनने के बाद से विगत तीन सालों का इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज की आय व्यय का ब्यौरा उपलब्ध कराया जाय।
इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज के बारे में धारणा है कि इंस्टीट्यट अपना संसाधन स्वयं जुटाता है। विश्वविद्यालय के केंद्रीय बनने के बाद से अब तक इस इंस्टीट्यट को कितना अनुदान दिया गया है। और अन्य किन मदों में विश्वविद्यालय ने इंस्टीट्यट को अनुदान उपलब्ध कराया है अगर अनुदान उपलब्ध कराया है तो इसका ब्यौरा उपलब्ध कराया है तो फिर ये तर्क क्यों दिया जाता है कि इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज स्वयं के संसाधनों पर संचालित है।
इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज में चल रहा प्रत्येक पाठ्यक्रम विषय अनुसार विश्वविद्यालय में यूजीसी के मानकों के अनुसान चल रहे विभागों में वहां के विभागाध्यक्षों के निर्देंशन में चलाया जाय। सेंटर के एकेडमिक प्रोग्राम को संदर्भित विभाग की बोर्ड आॅफ स्टडीज व उसी की बोर्ड आॅफ फेकल्टी से पारित होने के बाद शुरु किया जाय।
इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज के सभी डिप्लोमा के सभी अंकपत्र परीक्षा नियंत्रक के हस्ताक्षर के बगैर अवैध माना जाय। जिन पाठ्यक्रमों के अंकपत्रों पर परीक्षा नियंत्रक हस्ताक्षर करने से संवैद्यानिक रुप से इनकार करता हो उस पाठ्यक्रम को तत्काल बंद कर दिया जाय। विश्वविद्यालय में चल रही दोहरे अंकपत्र देने की व्यवस्था को समाप्त किया जाय।
व्यवसायिक कोर्सों के लिए यूजीसी/एआईसीटी द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार संसाधनों (लैब, लाईब्रेरी और छात्र संख्या के अनुपात में स्थायी प्राध्यापक ) कि व्यवस्था की जाय।
प्रत्येक विभाग के अंतर्गत चलने वाले व्यवसायिक कोर्सों के लिए (इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज को समाप्त करने के बाद विषय संबधित विभाग मंे शुरु किए पाठ्यक्रम के संदर्भ में ) एवं नये कोर्स जो सत्र 2009-10 के लिए प्रस्तावित हंै, में प्रवेश प्रक्रिया तब तक न शुरु की जाय जब तक यूजीसी/एआईसीटी द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार संसाधनों (लैब, लाईब्रेरी और छात्र संख्या के अनुपात में स्थायी प्राध्यापक ) की व्यवस्था न हो जाय।
व्यवसायिक कोर्सों (इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज को समाप्त करने के बाद विषय संबधित विभाग मंे शुरु किए पाठ्यक्रम को शामिल करते हुए विश्वविद्यालय के सभी व्यवसायिक कोर्से के संदर्भ में ) निर्धारित फीस ढांचे को बदला जाय। तर्कसंगत फीस ढ़ंाचे के लिए विशेषज्ञों की समिति गठित की जाय।
महोदय/महोदया से अपील है कि मामले की गंभीरता को समझते हुए अतिशीघ्र कार्यवाही कर देश के अन्य शिक्षण संस्थानों के लिए भी मिसाल के बतौर अनिवार्य रुप से बेहतर शैक्षणिक व्यवस्था की उपलब्धता सुनिश्चित करंे।
-धन्यवाद
समस्त छात्र
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग,
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद
राष्ट्रपति/कुलाधिपति,
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद
पत्रकारिता विभाग के समानांतर एक और सेल्फ फायनेंस कोर्स चलाने और पत्रकारिता विभाग की उपेक्षा करने के संदर्भ मंे विभाग के छात्रों द्वारा प्रेषित मांगपत्र
महोदय/महोदया,
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के समानांतर एक और सेल्फ फायनेंस कोर्स चलाने और पत्रकारिता विभाग की उपेक्षा करने के संदर्भ मंे विभाग के छात्रों द्वारा विरोध प्रदर्शन के 15वें दिन विश्वविद्यालय के कुलपति को आंदोलन के पहले दिन 3 सितम्बर 2009 को सौंपी गयी हमारी मांगों के संदर्भ में आपकी तरफ से कोई जवाब न मिलने पर असंतोष लगातार बढ़ रहा है। हमारे आंदोलन को देशव्यापी जनसमर्थन मिल रहा है। राष्टीय हो चले इस आंदोलन का दायरा बढ़ने के कारण इस आंदोलन के जरिये उठायी गयी हमारी मांगों पर राष्टीयस्तर पर सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है। कृपया ध्यान दें हमारे पहले 3 सितग्बर को कुलपति महोदय इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद को सौंपा गया था, मांगपत्र में इन मांगो को सम्मिलित कर हमारी मांगे बिंदुवार निम्नवत हैं -
पिछले 25 साल से चल रहे पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग की लगातार उपेक्षा की गयी है। अब इस विभाग के लिए यूजीसी के निर्धारित मानदण्डों के अनुरुप संसाधन ( कम्प्यूटर लैब, आडियो-विडियों लैब, फोटोग्राफी डार्करुम, लाईब्रेरी, क्लासरुम, और स्थायी प्राध्यापक ) की व्यवस्था तत्काल प्रभाव से की जाय। ये व्यवस्था द्वितीय छमाही छमाही (सत्र 2009-10 के लिए ) की समाप्ती से पूर्व हो जानी चाहिए।
इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज के तहत इंस्टीट्यूट फाॅर फोटोजर्नलिज्म एण्ड विजुअल कम्यूनिकेशन में इसी सत्र (2009-10 सत्र) से शुरु किये जा रहे बीए इन मीडिया स्टडी के पाठ्यक्रम में प्रवेश पर तत्काल रोक लगाई जाय। अगर विश्वविद्यालय को स्नातक स्तर का ऐसा कोर्स चलाना है तो संबधित विभाग में ही पर्याप्त संसाधन की व्यवस्था करके ही चलाया जाय।
इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज की स्ववित्तपोषिता खत्म/समाप्त किया जाय। (राज्य स्तरीय विश्वविद्यालय 2005 में इसकी स्थापना के समय जिस उद्देश्य से इसे सृजित किया गया था, मसलन विश्वविद्यालय अपने लिए खुद संसाधन जुटायेंगे, की प्रासंगिकता अब समाप्तप्राय है क्योंकि केंद्रीय दर्जा पाने के बाद से विश्विद्यालय ने धन न खर्चकर पाने की वजह से वार्षिक अनुदान की धनराशि हर साल वापस लौटाई है।) अब इन सभी पाठ्यक्रमों की फीस न्यायसंगत एवं तर्कसंगत की जाय और छात्रों के उपर बोझ डालने के बजाय विश्वविद्यालय की बैंकों में जमापूंजी के ब्याज पर इन कोर्सों को चलाया जाय बाद में विश्वविद्यालय के बजट में प्रावधान किया जाय।
यूजीसी के मानको के अनुसार किसी भी विभाग/संस्था के अध्यक्ष/डायरेक्टर को प्रत्येक दो वर्षों पर रोटेट करने का निर्देश का पालन किया जाय। इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज के डायरेक्टर को भी इस नियम के दायरे में लाकर तत्काल प्रभाव से हटा कर नयी नियुक्ति की जाय। क्या वजह है कि इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज के डायरेक्टर को यूजीसी के मानकों के अनुसार रोटेट नही किया गया। क्या इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज यूजीसी के मानकों से परे है?
इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज चलाये रखने का तर्क संसाधनों के नाम पर दिया जाता है। विश्वविद्यालय के केेंद्रीय बनने के बाद से विगत तीन सालों का इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज की आय व्यय का ब्यौरा उपलब्ध कराया जाय।
इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज के बारे में धारणा है कि इंस्टीट्यट अपना संसाधन स्वयं जुटाता है। विश्वविद्यालय के केंद्रीय बनने के बाद से अब तक इस इंस्टीट्यट को कितना अनुदान दिया गया है। और अन्य किन मदों में विश्वविद्यालय ने इंस्टीट्यट को अनुदान उपलब्ध कराया है अगर अनुदान उपलब्ध कराया है तो इसका ब्यौरा उपलब्ध कराया है तो फिर ये तर्क क्यों दिया जाता है कि इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज स्वयं के संसाधनों पर संचालित है।
इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज में चल रहा प्रत्येक पाठ्यक्रम विषय अनुसार विश्वविद्यालय में यूजीसी के मानकों के अनुसान चल रहे विभागों में वहां के विभागाध्यक्षों के निर्देंशन में चलाया जाय। सेंटर के एकेडमिक प्रोग्राम को संदर्भित विभाग की बोर्ड आॅफ स्टडीज व उसी की बोर्ड आॅफ फेकल्टी से पारित होने के बाद शुरु किया जाय।
इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज के सभी डिप्लोमा के सभी अंकपत्र परीक्षा नियंत्रक के हस्ताक्षर के बगैर अवैध माना जाय। जिन पाठ्यक्रमों के अंकपत्रों पर परीक्षा नियंत्रक हस्ताक्षर करने से संवैद्यानिक रुप से इनकार करता हो उस पाठ्यक्रम को तत्काल बंद कर दिया जाय। विश्वविद्यालय में चल रही दोहरे अंकपत्र देने की व्यवस्था को समाप्त किया जाय।
व्यवसायिक कोर्सों के लिए यूजीसी/एआईसीटी द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार संसाधनों (लैब, लाईब्रेरी और छात्र संख्या के अनुपात में स्थायी प्राध्यापक ) कि व्यवस्था की जाय।
प्रत्येक विभाग के अंतर्गत चलने वाले व्यवसायिक कोर्सों के लिए (इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज को समाप्त करने के बाद विषय संबधित विभाग मंे शुरु किए पाठ्यक्रम के संदर्भ में ) एवं नये कोर्स जो सत्र 2009-10 के लिए प्रस्तावित हंै, में प्रवेश प्रक्रिया तब तक न शुरु की जाय जब तक यूजीसी/एआईसीटी द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार संसाधनों (लैब, लाईब्रेरी और छात्र संख्या के अनुपात में स्थायी प्राध्यापक ) की व्यवस्था न हो जाय।
व्यवसायिक कोर्सों (इंस्टीट्यट अॅाफ प्रोफेशनल स्टडीज को समाप्त करने के बाद विषय संबधित विभाग मंे शुरु किए पाठ्यक्रम को शामिल करते हुए विश्वविद्यालय के सभी व्यवसायिक कोर्से के संदर्भ में ) निर्धारित फीस ढांचे को बदला जाय। तर्कसंगत फीस ढ़ंाचे के लिए विशेषज्ञों की समिति गठित की जाय।
महोदय/महोदया से अपील है कि मामले की गंभीरता को समझते हुए अतिशीघ्र कार्यवाही कर देश के अन्य शिक्षण संस्थानों के लिए भी मिसाल के बतौर अनिवार्य रुप से बेहतर शैक्षणिक व्यवस्था की उपलब्धता सुनिश्चित करंे।
-धन्यवाद
समस्त छात्र
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग,
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद
बीहड़ रास्तों का सफर
प्रतिभा कटियार
हवाएं हमेशा नर्म नहीं होतीं. कभी-कभी पत्थर सी सख्त भी होती हैं. पानी की बूंदें हमेशा छई छप्प छई नहीं होतीं, वे तेज धार भी हो सकती हैं ऐसी कि तलवार को मात दे दें. तरुणाई ऐसी ही हवा और ऐसी ही पानी की बूंदों का नाम है. इलाहाबाद में चल रहा आंदोलन कई मामलों में प्रेरणापरक है. यह चलती हुई हवा के खिलाफ खड़े होने जैसा है. इस आंदोलन की बाबत मेरी कई यूनिवर्सिटीज में, कई लोगों से बात हुई. हर जगह गहरे असंतोष की जड़ें नजर आईं. छात्रों से बात हुई. आहत छात्रों से. शिक्षकों से भी. झुंझलाते, चिड़चिड़ाते लेकिन खामोश. मेरी समझ में नहीं आता कि ये खामोशी आखिर टूटती क्यों नहीं? चलो, इलाहाबाद में यह चुप्पी टूटी तो सही.
बहाव के साथ बहना हमेशा आसान होता है. लेकिन जरूरत वक्त के धारों को मोडऩे की होती है. गलत के खिलाफ डटकर खड़े होने की होती है. 27 सितंबर करीब है. यह दिन ज़ेहन से कभी नहीं निकलता. बंदूकों की खेती करने का दिन. सपने देखने का दिन. खुद पर विश्वास करने का दिन. भगतसिंह का जन्मदिन. भगतसिंह ऐसा नाम है, जिसे सुनते ही एक ओज महसूस होता है. जो हमेशा युवा ही रहा. चेग्वेरा का नाम भी ऐसा ही नाम है. ये नाम युवाओं के लिए प्रेरणा हैं. सारी प्रेरणाएं क्या किताबों में दर्ज होने के लिए हैं? बहुत हुआ तो कुछ लेख लिख देने के लिए. या और हुआ तो राजनीति में उतरकर मंच से भाषण देने के लिए. फिर एक शानदार पॉलिटिकल करियर.
छात्र जीवन में एक साफ दृष्टिकोण बनने की नींव पड़ती है. वही साफ दृष्टिकोण जो जीवन की हर मुश्किल राह पर संबल बनता है. जब विचार और विचारधाराएं किताबों से निकलकर िदगी में दाखिल होती हैं. अगर छात्र पत्रकारिता के हों तब बात और भी सं$जीदा हो जाती है. छात्रों के लिहाज से भी और शिक्षकों के लिहाज से भी.
जब शिक्षा की शुरुआत ही ऐसी समझौतापरस्ती पर पडऩे लगे तो क्या उम्मीद की जा सकती है. इलाहाबाद के छात्रों और उनके शिक्षक सुनील ने अपनी भूमिकाओं को समझा और विरोध का रास्ता अख्तियार किया. एक शांतिपूर्ण विरोध. अब देखना बस इतना है कि कितने कदम हैं जो इन लोगों के साथ होकर इसे कारवां बनाते हैं.
कई बार लडऩा ही जीतना होता है उस लिहाज से जीत हो चुकी है.
मेरी बधाई!
कार्ल मार्क्स की कविता सबके लिए-
बीहड़ रास्तों का सफर
आओ
हम बीहड़ और कठिन सुदूर
यात्रा पर चलें
आओ,
क्योंकि छिछला
निरुद्देश्य जीवन
हमें स्वीकार नहीं.
हम ऊंघते,
कलम घिसते हुए
उत्पीडऩ और लाचारी में
नहीं जियेंगे.
हम आकांक्षा
आक्रोश, आवेग
और अभिमान से
जियेंगे
असली इनसान की तरह.
- कार्ल मार्क्स
हवाएं हमेशा नर्म नहीं होतीं. कभी-कभी पत्थर सी सख्त भी होती हैं. पानी की बूंदें हमेशा छई छप्प छई नहीं होतीं, वे तेज धार भी हो सकती हैं ऐसी कि तलवार को मात दे दें. तरुणाई ऐसी ही हवा और ऐसी ही पानी की बूंदों का नाम है. इलाहाबाद में चल रहा आंदोलन कई मामलों में प्रेरणापरक है. यह चलती हुई हवा के खिलाफ खड़े होने जैसा है. इस आंदोलन की बाबत मेरी कई यूनिवर्सिटीज में, कई लोगों से बात हुई. हर जगह गहरे असंतोष की जड़ें नजर आईं. छात्रों से बात हुई. आहत छात्रों से. शिक्षकों से भी. झुंझलाते, चिड़चिड़ाते लेकिन खामोश. मेरी समझ में नहीं आता कि ये खामोशी आखिर टूटती क्यों नहीं? चलो, इलाहाबाद में यह चुप्पी टूटी तो सही.
बहाव के साथ बहना हमेशा आसान होता है. लेकिन जरूरत वक्त के धारों को मोडऩे की होती है. गलत के खिलाफ डटकर खड़े होने की होती है. 27 सितंबर करीब है. यह दिन ज़ेहन से कभी नहीं निकलता. बंदूकों की खेती करने का दिन. सपने देखने का दिन. खुद पर विश्वास करने का दिन. भगतसिंह का जन्मदिन. भगतसिंह ऐसा नाम है, जिसे सुनते ही एक ओज महसूस होता है. जो हमेशा युवा ही रहा. चेग्वेरा का नाम भी ऐसा ही नाम है. ये नाम युवाओं के लिए प्रेरणा हैं. सारी प्रेरणाएं क्या किताबों में दर्ज होने के लिए हैं? बहुत हुआ तो कुछ लेख लिख देने के लिए. या और हुआ तो राजनीति में उतरकर मंच से भाषण देने के लिए. फिर एक शानदार पॉलिटिकल करियर.
छात्र जीवन में एक साफ दृष्टिकोण बनने की नींव पड़ती है. वही साफ दृष्टिकोण जो जीवन की हर मुश्किल राह पर संबल बनता है. जब विचार और विचारधाराएं किताबों से निकलकर िदगी में दाखिल होती हैं. अगर छात्र पत्रकारिता के हों तब बात और भी सं$जीदा हो जाती है. छात्रों के लिहाज से भी और शिक्षकों के लिहाज से भी.
जब शिक्षा की शुरुआत ही ऐसी समझौतापरस्ती पर पडऩे लगे तो क्या उम्मीद की जा सकती है. इलाहाबाद के छात्रों और उनके शिक्षक सुनील ने अपनी भूमिकाओं को समझा और विरोध का रास्ता अख्तियार किया. एक शांतिपूर्ण विरोध. अब देखना बस इतना है कि कितने कदम हैं जो इन लोगों के साथ होकर इसे कारवां बनाते हैं.
कई बार लडऩा ही जीतना होता है उस लिहाज से जीत हो चुकी है.
मेरी बधाई!
कार्ल मार्क्स की कविता सबके लिए-
बीहड़ रास्तों का सफर
आओ
हम बीहड़ और कठिन सुदूर
यात्रा पर चलें
आओ,
क्योंकि छिछला
निरुद्देश्य जीवन
हमें स्वीकार नहीं.
हम ऊंघते,
कलम घिसते हुए
उत्पीडऩ और लाचारी में
नहीं जियेंगे.
हम आकांक्षा
आक्रोश, आवेग
और अभिमान से
जियेंगे
असली इनसान की तरह.
- कार्ल मार्क्स
17 सित॰ 2009
हम लड़ेगें साथी
इलाहाबाद में चल रहे निजीकरण विरोधी आंदोलन ने छात्रों पर लग रहे उस आरोप कि छात्र ‘करियररिस्ट’ हो गया है की छवि को तोड़ते हुए सत्तासीन ताकतों के बाज़ारवादी एजेण्डे को बेनकाब कर दिया है। हम इस आंदोलन का समर्थन करते हुए हर स्तर पर इस आंदोलन में हमकदम बनेगे। आज जब अखबार पैसे लेकर ख़बर छाप रहे हैं उस दौर में पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों और प्रोफेशनलिज्म को इलाहाबाद के पत्रकारिता के छात्र परिभाषित कर रहें है।
इलाहाबाद से शुरु इस राष्ट्रिय आंदोलन में आज जरुरत है कि इसे देशभर के शिक्षण संस्थानों में ले जाया जाय। जिस तरह से पत्रकारिता विभाग के समानांतर बीए इन मीडिया स्टडीज की दुकान खोलने की कवायद चल रही है ऐसी कवायद पूरे देशभर में चल रही हैं। पहले तो संसाधनों का रोना रोकर सुविधाएं कम की जाती है कि उसके बाद उसके हल के बतौर खून चूसने वाली दुकाने विश्वविद्यालयों में खोली जा रही हैं। इलाहाबाद के साथी धन्यवाद के पात्र हैं जो उंहोने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद इस आंदोलन को बहादुराना अंदाज में छेड़ दिया। आज जब व्यवस्था छठे वेतन आयोग को लागू कर शिक्षकांे को भी तुष्ट कर दिया है। ऐसे दौर में पत्रकारिता के शिक्षक सुनील उमराव ने एक मिसाल कायम की है की निजीकरण और बाजारीकरण का विरोध सिर्फ मंचों पर ही नहीं सड़कों पर भी होगा।
पत्रकारिता विभाग के छात्रों द्वारा जारी अपील और अनिल यादव का सालों पुराना लेख कम्पनी बाग में देशी फूल वैश्विक स्तर पर उदार होने के नाम पर थोपी जा रही नीतियों पर तमाचा है। विश्वविद्यालय जैसे आधुनिक शिक्षण संस्थान में जिस सामाजिक कार्यकर्ता संपत पाल को परिसर में संगीना के दम पर घुसने नही दिया। इस घटना ने पूरे देश के सामने इस बात को ला दिया है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में लोकतंत्र का गला घोट दिया है। और बु़ि़द्धजीवियों का तमगा लिए शिक्षक विश्वविद्यालय को ‘‘विश्वविद्यालय’’ के रुप में तब्दील कर दिया है। आज जरुरत इस बात की है कि आधुनिक दौर में विश्वविद्यालयों की क्या संकल्पना होगी इस पर विचार किया जाय। क्योंकि जिस तरह पिछले दिनों राष्ट्रªीय ख़बरों के अनुसार कुलानुशासक जटाशंकर त्रिपाठी ने छात्रों को बाहरी कह मुर्गा बनवाया उसने विश्वविद्यालय की पूरी संकल्पना को नेस्तानाबूत कर दिया। क्या आखिर विश्वविद्यालय को समझने जानने के लिए कोई बाहरी व्यक्ति नही आ सकता। और अपने को बुद्धिजीवी का तमगा लगाये लोग उसे अपमानित करेंगे। हम भारतीय जनसंचार संस्थान के छात्र आपके आंदोलन में हरकदम आपके साथ रहने का वादा करते हुए आपके बीमार कुलपति को जादू की झप्पी देते हुए गेट वेल सून मेंटली बोलते हैं।
- ऋषि कुमार सिंह, विनय जायसवाल, अरुण वर्मा, प्रबुद्ध गौतम, अरुण उराव, अर्चना महतो, सौम्य झा, पूर्णिमा उरांव, प्रिया मिश्रा, विजय प्रताप, मणींद्र मिश्रा, हिमांशु शेखर, हेमेंद्र मिश्रा, प्रियभांशू, समेत पूरा भारतीय जनसंचार संस्थान परिवार
इलाहाबाद से शुरु इस राष्ट्रिय आंदोलन में आज जरुरत है कि इसे देशभर के शिक्षण संस्थानों में ले जाया जाय। जिस तरह से पत्रकारिता विभाग के समानांतर बीए इन मीडिया स्टडीज की दुकान खोलने की कवायद चल रही है ऐसी कवायद पूरे देशभर में चल रही हैं। पहले तो संसाधनों का रोना रोकर सुविधाएं कम की जाती है कि उसके बाद उसके हल के बतौर खून चूसने वाली दुकाने विश्वविद्यालयों में खोली जा रही हैं। इलाहाबाद के साथी धन्यवाद के पात्र हैं जो उंहोने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद इस आंदोलन को बहादुराना अंदाज में छेड़ दिया। आज जब व्यवस्था छठे वेतन आयोग को लागू कर शिक्षकांे को भी तुष्ट कर दिया है। ऐसे दौर में पत्रकारिता के शिक्षक सुनील उमराव ने एक मिसाल कायम की है की निजीकरण और बाजारीकरण का विरोध सिर्फ मंचों पर ही नहीं सड़कों पर भी होगा।
पत्रकारिता विभाग के छात्रों द्वारा जारी अपील और अनिल यादव का सालों पुराना लेख कम्पनी बाग में देशी फूल वैश्विक स्तर पर उदार होने के नाम पर थोपी जा रही नीतियों पर तमाचा है। विश्वविद्यालय जैसे आधुनिक शिक्षण संस्थान में जिस सामाजिक कार्यकर्ता संपत पाल को परिसर में संगीना के दम पर घुसने नही दिया। इस घटना ने पूरे देश के सामने इस बात को ला दिया है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में लोकतंत्र का गला घोट दिया है। और बु़ि़द्धजीवियों का तमगा लिए शिक्षक विश्वविद्यालय को ‘‘विश्वविद्यालय’’ के रुप में तब्दील कर दिया है। आज जरुरत इस बात की है कि आधुनिक दौर में विश्वविद्यालयों की क्या संकल्पना होगी इस पर विचार किया जाय। क्योंकि जिस तरह पिछले दिनों राष्ट्रªीय ख़बरों के अनुसार कुलानुशासक जटाशंकर त्रिपाठी ने छात्रों को बाहरी कह मुर्गा बनवाया उसने विश्वविद्यालय की पूरी संकल्पना को नेस्तानाबूत कर दिया। क्या आखिर विश्वविद्यालय को समझने जानने के लिए कोई बाहरी व्यक्ति नही आ सकता। और अपने को बुद्धिजीवी का तमगा लगाये लोग उसे अपमानित करेंगे। हम भारतीय जनसंचार संस्थान के छात्र आपके आंदोलन में हरकदम आपके साथ रहने का वादा करते हुए आपके बीमार कुलपति को जादू की झप्पी देते हुए गेट वेल सून मेंटली बोलते हैं।
- ऋषि कुमार सिंह, विनय जायसवाल, अरुण वर्मा, प्रबुद्ध गौतम, अरुण उराव, अर्चना महतो, सौम्य झा, पूर्णिमा उरांव, प्रिया मिश्रा, विजय प्रताप, मणींद्र मिश्रा, हिमांशु शेखर, हेमेंद्र मिश्रा, प्रियभांशू, समेत पूरा भारतीय जनसंचार संस्थान परिवार
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